50 रुपये में मकान नंबर प्लेट लगाने का आदेश निरस्त, ग्रामीणों में असमंजस; वसूली की राशि वापसी पर सवाल
मुंगेली जिले के लोरमी क्षेत्र में मकानों पर नंबर प्लेट लगाने के लिए 50 रुपये शुल्क निर्धारित करने वाला प्रशासनिक आदेश बाद में निरस्त कर दिया गया। आदेश निरस्त होने के बाद ग्रामीणों में असमंजस की स्थिति है। अब सवाल उठ रहा है कि जिन लोगों से राशि ली गई, क्या उन्हें पैसा वापस किया जाएगा और आदेश निरस्त करने के पीछे प्रशासनिक कारण क्या थे।
UNITED NEWS OF ASIA. राकेश भास्कर, मुंगेली/लोरमी। ग्रामीण क्षेत्रों में मकानों की पहचान के लिए स्थायी नंबर प्लेट लगाने की योजना को लेकर जारी आदेश के बाद अब प्रशासन द्वारा इसे निरस्त किए जाने से ग्रामीणों और क्षेत्रवासियों में असमंजस की स्थिति बन गई है। मामला मकानों पर नंबर प्लेट लगाने के लिए निर्धारित 50 रुपये शुल्क और बाद में आदेश निरस्त किए जाने से जुड़ा है। अब ग्रामीणों के बीच यह सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है कि पहले अनुमति देने और शुल्क निर्धारित करने के बाद आखिर आदेश को निरस्त करने की जरूरत क्यों पड़ी।
जानकारी के अनुसार, कलेक्टर कार्यालय मुंगेली के 18 फरवरी 2026 के ज्ञापन के आधार पर सूर्यांश जन कल्याण संस्था, बिलासपुर को ग्रामीण क्षेत्रों में मकानों पर नंबर प्लेट लगाने की अनुमति दी गई थी। जारी आदेश के अनुसार प्रत्येक मकान पर नंबर प्लेट लगाने के लिए 50 रुपये शुल्क निर्धारित किया गया था। आदेश में यह भी उल्लेख था कि यह राशि मकान मालिक द्वारा स्वेच्छा से दी जाएगी।
प्रशासनिक निर्देशों में स्पष्ट किया गया था कि किसी भी ग्रामीण पर 50 रुपये का भुगतान करने के लिए दबाव नहीं बनाया जाएगा। इसके अलावा ग्राम पंचायत या जनपद पंचायत के कोष से इस कार्य के लिए किसी प्रकार की राशि खर्च नहीं की जानी थी। नंबर प्लेट के माध्यम से मकान की पहचान सुनिश्चित करने के साथ स्वच्छता और शासन की योजनाओं से जुड़े संदेशों का प्रचार-प्रसार भी किया जाना था।
नंबर प्लेट पर “स्वच्छ भारत, स्वच्छ छत्तीसगढ़” और “मेरा गांव साफ हो, उसमें मेरा भी हाथ हो” जैसे नारों को प्रदर्शित किया जाना था। आदेश में मकान नंबर को जनगणना, मतदाता सूची, राशन कार्ड सहित विभिन्न प्रशासनिक कार्यों में उपयोगी बताया गया था। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में मकानों की पहचान और प्रशासनिक रिकॉर्ड को व्यवस्थित करने में मदद मिलने की बात कही गई थी।
हालांकि, बाद में जिला प्रशासन द्वारा पूर्व में जारी उक्त आदेश को निरस्त कर दिया गया। आदेश निरस्त होने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में नंबर प्लेट लगाने की प्रक्रिया को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। ग्रामीणों का सवाल है कि जब योजना के तहत अनुमति जारी की गई थी, तो उसे बाद में किन प्रशासनिक कारणों से रद्द किया गया।
सबसे अहम सवाल उन लोगों की राशि को लेकर उठ रहा है, जिनसे कथित तौर पर 50-50 रुपये लिए जा चुके हैं। ग्रामीण जानना चाहते हैं कि आदेश निरस्त होने के बाद यदि किसी व्यक्ति से राशि ली गई है, तो क्या वह पैसा वापस किया जाएगा। वहीं कुछ लोग इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग भी कर रहे हैं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि आदेश के तहत कितने मकानों पर नंबर प्लेट लगाई गई और कितने लोगों से शुल्क लिया गया।
फिलहाल प्रशासन के आदेश निरस्त करने के कारण और राशि वापसी को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। ऐसे में संबंधित अधिकारियों से पूरे मामले में तथ्य सामने रखने और ग्रामीणों की शंकाओं का समाधान करने की अपेक्षा की जा रही है। दस्तावेजों और वास्तविक भुगतान की जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इस प्रक्रिया में कितनी राशि एकत्र हुई और आगे उसका क्या किया जाएगा।