रामजी साहू के पास 1.809 हेक्टेयर कृषि भूमि है। वे अपनी जमीन पर मौसम के अनुसार अलग-अलग फसलों का उत्पादन करते हैं। खरीफ मौसम में धान के साथ अरहर और कोदो की अंतवर्तीय फसल लेते हैं। इसके बाद रबी मौसम में गन्ना और चना तथा जायद मौसम में उड़द और मूंग की खेती कर रहे हैं। इस तरह उन्होंने एक ही फसल पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग फसलों को कृषि व्यवस्था में शामिल किया है। फसल विविधीकरण से खेती में जोखिम को अलग-अलग फसलों में बांटने और वर्षभर कृषि गतिविधियों को जारी रखने में मदद मिलती है।
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत रामजी साहू को योजना शुरू होने के बाद से अब तक 23 किस्तों में कुल 46 हजार रुपये की राशि प्राप्त हुई है। उनके अनुसार यह राशि खेती के दौरान होने वाली जरूरी जरूरतों को पूरा करने में उपयोगी रही। कृषि कार्यों में जुताई, बोवाई, निदाई और मिसाई जैसे कामों के लिए समय-समय पर होने वाले खर्च के बीच इस तरह की आर्थिक सहायता उनके लिए सहारा बनी।
खेती में प्राकृतिक परिस्थितियों और मौसम से जुड़े जोखिम बने रहते हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत मिली सहायता ने भी रामजी साहू को आर्थिक सुरक्षा प्रदान की। खरीफ वर्ष 2025-26 में धान की फसल के लिए उन्हें 66,217 रुपये की बीमा दावा राशि मिली, जबकि रबी वर्ष 2025-26 में चना फसल के लिए 54,768 रुपये का दावा प्राप्त हुआ। इस तरह वित्तीय वर्ष 2025-26 में उन्हें कुल 1,20,985 रुपये की बीमा दावा राशि मिली। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का उद्देश्य प्राकृतिक और अन्य अप्रत्याशित परिस्थितियों से फसल नुकसान की स्थिति में किसानों को वित्तीय सहायता देना है।
कृषक उन्नति योजना के तहत वर्ष 2025-26 में रामजी साहू ने 42 क्विंटल धान का विक्रय किया। इसके एवज में उन्हें 96,600 रुपये प्राप्त हुए। इसके अतिरिक्त 33,300 रुपये बोनस के रूप में मिले। इस तरह धान बिक्री और बोनस से उनकी कुल प्राप्ति 1,30,200 रुपये रही। वहीं धान के बदले अरहर लेने पर उन्हें 14,700 रुपये का लाभ भी मिला।
रामजी साहू का कहना है कि कृषि योजनाओं से मिली आर्थिक सहायता ने खेती से जुड़े विभिन्न कार्यों में सहयोग दिया। अलग-अलग फसलों से होने वाली आय और योजनाओं से प्राप्त लाभ के कारण उनकी आर्थिक स्थिति पहले की तुलना में मजबूत हुई है। इससे परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने में भी मदद मिली और खेती के प्रति उनका आत्मविश्वास बढ़ा है। उनकी कहानी इस बात को दर्शाती है कि मेहनत, फसल विविधीकरण और उपलब्ध कृषि योजनाओं का समुचित लाभ मिलकर छोटे स्तर की खेती को भी अधिक व्यवस्थित और टिकाऊ बनाने में मदद कर सकते हैं।