झीरम मामले में सुरक्षा चूक पर उठे सवाल, पूर्व उप मुख्यमंत्री के बयान ने खोले पुराने जख्म: चरणदास महंत

छत्तीसगढ़ विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत ने झीरम घाटी मामले में आए अदालती फैसले और पूर्व उप मुख्यमंत्री के बयान को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि संवेदनशील क्षेत्र में सुरक्षा बलों की अनुपस्थिति और पूर्व सूचना के बावजूद सुरक्षा व्यवस्था में हुई चूक की व्यापक जांच जरूरी है। महंत ने सुरक्षा हटाने और कथित खुफिया अलर्ट की अनदेखी करने वालों की भूमिका की जांच की मांग की।

Sep 7, 2026 - 09:20
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झीरम मामले में सुरक्षा चूक पर उठे सवाल, पूर्व उप मुख्यमंत्री के बयान ने खोले पुराने जख्म: चरणदास महंत

UNITED NEWS OF ASIA. छत्तीसगढ़ विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत ने झीरम घाटी मामले में आए ताजा अदालती फैसले और तत्कालीन परिस्थितियों को लेकर सामने आए पूर्व उप मुख्यमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि झीरम घाटी की घटना ने छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और सामाजिक जीवन पर गहरा असर डाला है। इस मामले में शहीद हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं, जवानों और कार्यकर्ताओं के परिवारों को अब भी पूरे सच और न्याय की प्रतीक्षा है।

चरणदास महंत ने कहा कि झीरम घाटी की घटना को केवल नक्सली हमले के रूप में देखने के बजाय इससे जुड़े सभी पहलुओं की व्यापक जांच की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि इस घटना में विद्याचरण शुक्ल, नंदकुमार पटेल, महेंद्र कर्मा, उदय मुदलियार सहित कांग्रेस के कई नेताओं और जवानों एवं कार्यकर्ताओं की जान गई थी। उनके अनुसार, घटना के पीछे किसी बड़े राजनीतिक आपराधिक षड्यंत्र की आशंका से जुड़े सवालों का जवाब अभी सामने आना बाकी है।

नेता प्रतिपक्ष ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि क्षेत्र में नक्सली गतिविधियों को लेकर पहले से खुफिया इनपुट मौजूद था, तो संवेदनशील क्षेत्र में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था क्यों नहीं थी। उन्होंने कहा कि जगदलपुर से सुकमा मार्ग का संबंधित क्षेत्र सुरक्षा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता था। ऐसे में वहां सुरक्षा बलों की मौजूदगी और सुरक्षा प्रबंधों को लेकर स्पष्ट जवाब सामने आना चाहिए।

महंत ने दावा किया कि कांग्रेस की ओर से काफिले के प्रस्थान, मार्ग और उसमें शामिल वरिष्ठ नेताओं की जानकारी प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों को दी गई थी। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि डीजीपी से लेकर स्थानीय पुलिस अधिकारियों तक काफिले से संबंधित जानकारी पहुंचाई गई थी, तो इसके बावजूद पूरे मार्ग पर पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था क्यों नहीं की गई। उन्होंने कहा कि सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े निर्णय लेने वाले अधिकारियों की भूमिका की जांच होना आवश्यक है।

पूर्व उप मुख्यमंत्री के उस कथित बयान का उल्लेख करते हुए महंत ने कहा कि संवेदनशील क्षेत्र में सुरक्षा बलों की अनुपस्थिति को लेकर सामने आई जानकारी कई गंभीर सवाल खड़े करती है। उन्होंने कहा कि यदि काफिले की सुरक्षा में बदलाव या सुरक्षा बलों की वापसी हुई थी, तो इसके आदेश किस स्तर पर दिए गए और इसके पीछे क्या कारण थे, इसकी जांच की जानी चाहिए।

चरणदास महंत ने कहा कि झीरम मामले में अदालती प्रक्रिया का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन घटना के व्यापक पहलुओं को भी जांच के दायरे में लाना जरूरी है। उनके अनुसार, केवल जमीनी स्तर पर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई से उन सवालों का समाधान नहीं होता जो सुरक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक निर्णयों और कथित राजनीतिक षड्यंत्र से जुड़े हैं।

उन्होंने मांग की कि काफिले की सुरक्षा से संबंधित निर्णयों, कथित खुफिया सूचनाओं और तत्कालीन प्रशासनिक व्यवस्था की निष्पक्ष एवं व्यापक जांच कराई जाए। महंत ने कहा कि जिन अधिकारियों या उच्चस्तरीय पदों पर बैठे लोगों की भूमिका सामने आती है, उनकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि झीरम घाटी में शहीद हुए नेताओं, जवानों और कार्यकर्ताओं की स्मृति केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि घटना के सभी अनुत्तरित सवालों का जवाब सामने आना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक घटना से जुड़े प्रत्येक पहलू की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय नहीं होती, तब तक पीड़ित परिवारों की न्याय की अपेक्षा पूरी तरह समाप्त नहीं होगी।