देवगढ़ किले के ऐतिहासिक बोर्ड को लेकर उठे सवाल, राजा जाटबा के इतिहास पर तथ्यात्मक चर्चा की मांग

देवगढ़ किले में लगे एक ऐतिहासिक बोर्ड की जानकारी को लेकर सामाजिक बंधुओं ने तथ्यात्मक समीक्षा की मांग की है। उपलब्ध ऐतिहासिक संदर्भों में राजा जाटबा के हरियागढ़ से देवगढ़ आकर स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने का उल्लेख बताया गया है। इसी आधार पर बोर्ड में दिए गए विवरण और ऐतिहासिक प्रमाणों के बीच अंतर को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

Sep 7, 2026 - 20:01
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देवगढ़ किले के ऐतिहासिक बोर्ड को लेकर उठे सवाल, राजा जाटबा के इतिहास पर तथ्यात्मक चर्चा की मांग

UNITED NEWS OF ASIA. यज्ञ राज पटेल, छिंदवाड़ा l किले में लगे एक ऐतिहासिक बोर्ड पर दर्ज जानकारी को लेकर सामाजिक स्तर पर चर्चा शुरू हुई है। सामाजिक बंधुओं की ओर से बोर्ड में उल्लेखित इतिहास और विभिन्न ऐतिहासिक संदर्भों में मिलती जानकारी का अवलोकन कर तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट करने की मांग की गई है। इस संबंध में विशेष रूप से राजा जाटबा के देवगढ़ आगमन और उनके शासन से जुड़े इतिहास का उल्लेख किया गया है।

सामाजिक बंधुओं का कहना है कि वीडियो में ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में ‘आईने अकबरी’ का संदर्भ दिया गया है। इसी तरह आचार्य मोती रावण कंगाली की पुस्तक ‘गोंडवाना का सांस्कृतिक इतिहास’ में भी राजा जाटबा के हरियागढ़ परगना से देवगढ़ आने और यहां अपनी राजधानी स्थापित करने का उल्लेख बताया गया है। हालांकि देवगढ़ किले में लगे बोर्ड में ग्वाली बंधुओं के शासन तथा राजा जाटबा के उनके यहां कार्य करने से संबंधित जानकारी दर्ज होने की बात कही गई है। इसी बिंदु को लेकर ऐतिहासिक तथ्यों के बीच अंतर पर सवाल उठाए गए हैं।

प्रस्तुत ऐतिहासिक विवरण के अनुसार राजा जाटबा हरियागढ़ के राजा वीरभान उईका के समय उनकी सेना में कार्यरत थे। बताया जाता है कि राजा वीरभान की एक ही पुत्री थी और वे अपने राज्य के भावी उत्तराधिकारी को लेकर चिंतित थे। इसी क्रम में योग्य वर की तलाश के लिए एक चुनौती रखी गई।

विवरण के अनुसार मुनादी कराई गई कि जो वीर युवक एक ही वार में बोदे का सिर अलग कर देगा, उसका विवाह राजकुमारी से किया जाएगा और उसे हरियागढ़ राज्य का भावी उत्तराधिकारी घोषित किया जाएगा। प्रतियोगिता में भाग लेने वाले युवक के लिए सात देव सगा गोत्रधारी होना भी शर्त बताई गई थी।

कहा जाता है कि राजा की सेना में कार्यरत जाटबा नामक युवक ने इस चुनौती को स्वीकार किया और प्रतियोगिता में सफल रहा। इसके बाद राजा वीरभान ने अपनी पुत्री का विवाह जाटबा से किया तथा उन्हें राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया गया। आगे चलकर राजा जाटबा ने हरियागढ़ से अलग अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित की और देवगढ़ को अपनी राजधानी बनाया।

स्थानीय ऐतिहासिक परंपरा और प्रस्तुत संदर्भों के अनुसार देवगढ़ में राजा जाटबा का स्वतंत्र शासन 1580 ईस्वी के आसपास शुरू हुआ और लगभग 70 वर्षों तक जारी रहा। हालांकि इन दावों के विभिन्न पहलुओं की पुष्टि के लिए उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों, अभिलेखों और पुरातात्विक प्रमाणों का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है।

सामाजिक बंधुओं ने मांग की है कि देवगढ़ किले में लगाए गए बोर्ड की जानकारी को उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों के साथ मिलाकर देखा जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों तक सही और प्रमाणित इतिहास पहुंच सके। उनका कहना है कि ऐतिहासिक स्थलों पर प्रदर्शित जानकारी तथ्यपरक और विश्वसनीय स्रोतों पर आधारित होना जरूरी है। देवगढ़ के इतिहास से जुड़े विभिन्न मतों पर विशेषज्ञों और इतिहासकारों की राय सामने आने से इस विषय को और स्पष्टता मिल सकती है।