दंतेवाड़ा में पुनर्वास के नाम पर 34.50 लाख की वसूली का आरोप, 23 विस्थापित परिवारों ने उठाए सवाल
दंतेवाड़ा के भांसी कलारपारा में डिपॉजिट-4 खदान के लिए जमीन अधिग्रहण के बाद 23 प्रभावित परिवारों ने पुनर्वास की जमीन और NOC के नाम पर कुल 34.50 लाख रुपये लिए जाने का आरोप लगाया है। ग्रामीणों का दावा है कि प्रत्येक परिवार से 1.50 लाख रुपये लिए गए। कलेक्टर देवेश ध्रुव ने मामले की जांच कराने और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की बात कही है।
UNITED NEWS OF ASIA. नवीन चौधरी, दंतेवाड़ा l छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के भांसी क्षेत्र में डिपॉजिट-4 खदान के लिए जमीन अधिग्रहण के बाद पुनर्वास को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। भांसी के कलारपारा के 23 प्रभावित परिवारों ने आरोप लगाया है कि पुनर्वास की जमीन और वहां घर बनाने के लिए जरूरी NOC दिलाने के नाम पर उनसे कुल 34 लाख 50 हजार रुपये लिए गए। ग्रामीणों के मुताबिक, प्रत्येक परिवार से डेढ़-डेढ़ लाख रुपये लिए गए, जिसमें एक लाख रुपये ग्राम पंचायत के नाम पर और 50 हजार रुपये वन समिति के नाम पर लिए जाने की बात कही गई है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
ग्रामीणों का दावा है कि 23 परिवारों से डेढ़ लाख रुपये के हिसाब से कुल राशि 34.50 लाख रुपये होती है। प्रभावित परिवारों का कहना है कि उन्होंने यह राशि इस उम्मीद में दी कि पुनर्वास स्थल पर मकान बनाने और NOC से जुड़ी प्रक्रिया पूरी हो सकेगी। अब ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि जब पुनर्वास के लिए चिन्हित जमीन की वैधानिक स्थिति ही स्पष्ट नहीं है, तो NOC के नाम पर उनसे राशि किस आधार पर ली गई।
डिपॉजिट-4 खदान से नगरनार स्टील प्लांट के लिए लौह अयस्क उत्खनन प्रस्तावित है। इसके लिए एनसीएल, जो एनएमडीसी और सीएमडीसी का संयुक्त उपक्रम है, द्वारा भांसी और पोरो कमेली ग्राम पंचायत क्षेत्र में जमीन अधिग्रहण की कार्रवाई की गई है। इसी प्रक्रिया में भांसी कलारपारा के 23 परिवारों की जमीन भी अधिग्रहित की गई। प्रशासन की ओर से प्रभावित परिवारों के बैंक खातों में मुआवजे की राशि जमा कराए जाने की जानकारी है।
ग्रामीणों का आरोप है कि जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में उनकी सहमति और अधिकारों का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया। उनका यह भी दावा है कि जमीन, खेत, पेड़-पौधों और वन संपदा का मौके पर विस्तृत सर्वे नहीं किया गया तथा मूल्यांकन को लेकर भी सवाल हैं। प्रभावित परिवारों की मांग है कि जमीन और उससे जुड़ी संपत्तियों का दोबारा निष्पक्ष और मौके पर जाकर सर्वे कराया जाए, ताकि मुआवजे का वास्तविक आकलन हो सके।
सबसे बड़ी समस्या पुनर्वास की जमीन को लेकर सामने आ रही है। ग्रामीणों के मुताबिक, प्रशासन ने जिस भूमि को पुनर्वास के लिए चिन्हित किया है, उस पर वन विभाग की ओर से भी अधिकार जताया जा रहा है। ऐसे में प्रभावित परिवारों के सामने यह सवाल खड़ा हो गया है कि वे अपने नए घर कहां बनाएंगे। ग्रामीणों का कहना है कि मुआवजे की राशि मिलने के बावजूद यदि रहने के लिए वैकल्पिक जमीन उपलब्ध नहीं होती, तो उनके सामने गंभीर संकट पैदा हो सकता है।
प्रभावित परिवारों ने यह भी कहा है कि उन्हें अभी तक स्पष्ट नहीं बताया गया है कि पुनर्वास के तहत किस प्रकार का पट्टा या भूमि अधिकार दिया जाएगा। सामूहिक पुनर्वास और भूमि अधिकार की व्यवस्था को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने से उनकी चिंता बढ़ रही है। ग्रामीणों की मांग है कि घर बनाने की जमीन, पशुधन रखने की जगह और आवश्यक मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था पहले सुनिश्चित की जाए।
ग्रामीणों ने दोबारा सर्वे, स्पष्ट भूमि अधिकार और व्यवस्थित पुनर्वास की मांग की है। उनका कहना है कि विकास परियोजना के लिए जमीन देने में उन्हें आपत्ति नहीं है, लेकिन प्रभावित परिवारों के अधिकार, उचित मुआवजा और सम्मानजनक पुनर्वास सुनिश्चित होना चाहिए। वहीं पुनर्वास और NOC के नाम पर कथित राशि लिए जाने के आरोप की भी निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है।
दंतेवाड़ा कलेक्टर देवेश ध्रुव ने कहा है कि पूरे मामले की जांच कराई जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि ग्राम पंचायत और वन समिति के नाम पर पैसा लेना गलत है और जांच में यदि कोई दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। अब जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि 23 परिवारों से कथित तौर पर ली गई राशि का वास्तविक आधार क्या था और पुनर्वास की जमीन को लेकर विवाद का समाधान किस तरह किया जाएगा।