‘भोरमदेव बैगा आर्ट’ को मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान, नई दिल्ली सम्मेलन में दिखेगी कबीरधाम की आदिम कला
कबीरधाम की पारंपरिक ‘भोरमदेव बैगा आर्ट’ अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान बनाने जा रही है। नई दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन में इस कला का प्रदर्शन होगा। वन मंडल अधिकारी निखिल अग्रवाल और भोरमदेव आदिवासी चितेरे फाउंडेशन के प्रयासों से बैगा और गोंड कला को नई पहचान मिली है।
UNITED NEWS OF ASIA. सौरभ नामदेव, कवर्धा l कबीरधाम जिले की पारंपरिक आदिवासी कला ‘भोरमदेव बैगा आर्ट’ अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी अलग पहचान बनाने जा रही है। जिले की दीवारों पर उकेरी गई बैगा और गोंड कला की अनूठी चित्रकारी अब नई दिल्ली में आयोजित होने वाले अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन में प्रदर्शित की जाएगी। इस उपलब्धि से जिले के कलाकारों और कला प्रेमियों में उत्साह का माहौल है।
वन मंडल अधिकारी Nikhil Agrawal के मार्गदर्शन और ‘भोरमदेव आदिवासी चितेरे फाउंडेशन’ के प्रयासों से कबीरधाम वन मंडल की दीवारों को एक भव्य आर्ट गैलरी का स्वरूप दिया गया है। इन दीवारों पर बाघ, तेंदुआ, गौर, मयूर और दुर्लभ ऑरेंज ओगली तितली जैसी वन्य जीवों की आकर्षक कलाकृतियां बनाई गई हैं, जो लोगों को आदिम संस्कृति और प्रकृति से जोड़ रही हैं।
वन विभाग और फाउंडेशन के इस संयुक्त प्रयास से जिले की पारंपरिक कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिल रही है। आगामी 1 और 2 जून 2026 को नई दिल्ली में संकला फाउंडेशन द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन में ‘भोरमदेव बैगा आर्ट’ का विशेष प्रदर्शन किया जाएगा। इसके लिए राष्ट्रीय पेंटिंग अवार्ड विजेता और फाउंडेशन के डायरेक्टर Balbir Prasad Vishwakarma ने विशेष कैनवास पेंटिंग तैयार कर भेजी है।
बताया जा रहा है कि डीएफओ निखिल अग्रवाल ने कलाकारों की प्रतिभा को आगे बढ़ाने और उन्हें बड़े मंच उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके प्रयासों से ही कबीरधाम की यह कला भारत भवन भोपाल और अब दिल्ली जैसे बड़े कला मंचों तक पहुंच सकी है।
इस अभियान को सफल बनाने में फाउंडेशन के पदाधिकारियों और कलाकारों की पूरी टीम लगातार काम कर रही है। इनमें प्रभात विश्वकर्मा, लीलाधर नेताम, देवराज यादव, मन्नू जयराम मरावी और भागमती रात्रे सहित कई कलाकार शामिल हैं। सभी ने मिलकर जिले की दीवारों को पारंपरिक कला से सजाने का कार्य किया है।
राष्ट्रीय जनजातीय चित्रकार बलबीर प्रसाद विश्वकर्मा ने अपनी कला के माध्यम से सामाजिक जिम्मेदारी की भी मिसाल पेश की है। उन्होंने अपनी कमाई का 20 प्रतिशत हिस्सा जनजातीय कला संरक्षण और कलाकारों के कल्याण के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया है। उनकी कला को पहले भी भारत भवन भोपाल में सराहना मिल चुकी है।
वन विभाग और चितेरे फाउंडेशन की यह पहल अब पर्यटन और संस्कृति के नए संगम के रूप में देखी जा रही है। बैगा और गोंड कला की पारंपरिक शैली को आधुनिक प्रस्तुति के साथ लोगों तक पहुंचाया जा रहा है, जिससे युवा पीढ़ी भी अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ रही है।
कला प्रेमियों का मानना है कि इस तरह के प्रयासों से न केवल आदिवासी संस्कृति को संरक्षण मिलेगा, बल्कि स्थानीय कलाकारों को रोजगार और पहचान भी प्राप्त होगी। नई दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय मंच पर ‘भोरमदेव बैगा आर्ट’ की प्रस्तुति को कबीरधाम जिले के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।