सावन के प्रथम सोमवार पर 150 विद्यार्थियों ने तय की भोरमदेव पदयात्रा, संस्कृति और आस्था का दिया संदेश

कवर्धा में सावन के प्रथम सोमवार पर अशोका पब्लिक स्कूल के लगभग 150 विद्यार्थियों ने बूढ़ादेव मंदिर से भोरमदेव मंदिर तक 18 किलोमीटर की पदयात्रा में भाग लिया। अनुशासन, श्रद्धा और सांस्कृतिक मूल्यों के साथ निकली इस यात्रा में विद्यार्थियों ने शिवभक्ति, भारतीय परंपरा और सामाजिक समरसता का संदेश दिया।

Aug 4, 2026 - 11:00
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सावन के प्रथम सोमवार पर 150 विद्यार्थियों ने तय की भोरमदेव पदयात्रा, संस्कृति और आस्था का दिया संदेश

UNITED NEWS OF ASIA. सौरभ नामदेव, कवर्धा l कवर्धा में सावन मास के प्रथम सोमवार पर आयोजित भोरमदेव पदयात्रा श्रद्धा, संस्कृति और अनुशासन का अनूठा संगम बनकर सामने आई। इस वर्ष अशोका पब्लिक स्कूल के लगभग 150 विद्यार्थियों ने बूढ़ादेव मंदिर से भोरमदेव मंदिर तक आयोजित 18 किलोमीटर की पदयात्रा में भाग लेकर भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं के प्रति अपनी आस्था का परिचय दिया।

पदयात्रा की शुरुआत स्वयंभू पंच बूढ़ादेव मंदिर से हुई, जहां विद्यालय प्रबंधन ने पूजा-अर्चना कर विद्यार्थियों को यात्रा के लिए रवाना किया। भगवा ध्वज, हर-हर महादेव और बोल-बम के जयघोष के बीच निकली यात्रा ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। विद्यार्थी हाउस यूनिफॉर्म में अनुशासित पंक्तियों में चलते हुए श्रद्धा और अनुशासन की मिसाल बने।

यात्रा के दौरान बच्चों की सुरक्षा और सुविधा का विशेष ध्यान रखा गया। विद्यालय की ओर से पेयजल, फल, ग्लूकोज, नाश्ता, प्राथमिक उपचार की व्यवस्था के साथ सहयोगी वाहन और विशेष बस भी उपलब्ध कराई गई। कई छोटे बच्चों ने पूरी पदयात्रा नंगे पैर पूरी कर अपनी आस्था का परिचय दिया।

इस पदयात्रा का प्रमुख आकर्षण भगवान शिव की भव्य झांकी रही, जिसे विशेष रूप से तैयार किए गए वाहन पर सजाया गया था। शिव परिवार, भगवा ध्वज और आकर्षक सजावट से सुसज्जित झांकी ने श्रद्धालुओं और स्थानीय नागरिकों का ध्यान आकर्षित किया। पूरे मार्ग में ग्रामीणों ने पदयात्रियों का पुष्प वर्षा, प्रसाद, शीतल जल और अल्पाहार से स्वागत किया, जिससे सेवा और श्रद्धा की भारतीय परंपरा जीवंत होती दिखाई दी।

यात्रा के दौरान स्काउट्स एवं गाइड्स के विद्यार्थियों ने अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके सहयोग से पूरी पदयात्रा शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हुई। भोरमदेव मंदिर पहुंचने के बाद विद्यार्थियों ने भगवान शिव के दर्शन कर पूजा-अर्चना की तथा मंदिर के इतिहास, स्थापत्य कला और धार्मिक महत्व की जानकारी प्राप्त की।

विद्यालय प्रबंधन ने कहा कि विद्यार्थियों को केवल शैक्षणिक शिक्षा देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें भारतीय संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों से जोड़ना भी आवश्यक है। इस प्रकार की पदयात्राएं बच्चों में अनुशासन, सामूहिकता, सेवा भावना और सांस्कृतिक गौरव की भावना विकसित करती हैं।

भोरमदेव मंदिर छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों में प्रमुख स्थान रखता है। मैकल पर्वतमाला की गोद में स्थित यह प्राचीन शिव मंदिर अपनी उत्कृष्ट स्थापत्य कला के कारण "छत्तीसगढ़ का खजुराहो" भी कहलाता है। बूढ़ादेव से भोरमदेव तक की यह पदयात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन चुकी है। यात्रा के समापन पर विद्यार्थियों ने सामूहिक छायाचित्र लेकर इस यादगार अनुभव को संजोया तथा समाज में सांस्कृतिक जागरूकता और शिवभक्ति का संदेश दिया।