63 की उम्र में सुनहरी उड़ान: फोर्स अकादमी मँझगवां की कोच सुनीता सिंह ने राष्ट्रीय मंच पर लहराया छत्तीसगढ़ का परचम

फोर्स अकादमी मँझगवां की कोच सुनीता सिंह ने 63 वर्ष की उम्र में राष्ट्रीय मंच पर शानदार प्रदर्शन करते हुए 3000 मीटर वॉक में स्वर्ण और 100 मीटर रिले में कांस्य पदक जीतकर छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया। यह उपलब्धि 45वीं राष्ट्रीय मास्टर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में हासिल हुई, जो आत्मविश्वास, संघर्ष और समर्पण की प्रेरक मिसाल बन गई।

Feb 17, 2026 - 17:54
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63 की उम्र में सुनहरी उड़ान: फोर्स अकादमी मँझगवां की कोच सुनीता सिंह ने राष्ट्रीय मंच पर लहराया छत्तीसगढ़ का परचम

UNITED NEWS OF ASIA . अवास कैवर्त, गौरेला पेंड्रा मरवाही | कभी -कभी कुछ जीतें सिर्फ पदक नहीं होतीं, बल्कि वर्षों से अधूरे पड़े सपनों की वापसी होती हैं। छत्तीसगढ़ के मँझगवां क्षेत्र की कोच सुनीता सिंह ने 63 वर्ष की उम्र में यह सिद्ध कर दिया कि दृढ़ निश्चय और निरंतर अभ्यास से उम्र की सीमाएं भी टूट सकती हैं।

हाल ही में जबलपुर में आयोजित 45वीं राष्ट्रीय मास्टर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में सुनीता सिंह ने 3000 मीटर वॉक रेस में स्वर्ण पदक और 100 मीटर रिले रेस में कांस्य पदक जीतकर छत्तीसगढ़ का परचम राष्ट्रीय स्तर पर लहराया।

सुनीता सिंह शासकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय अंडी से व्यायाम शिक्षक पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी खेल से दूर नहीं हुईं। सेवा निवृत्ति के बाद जहां अधिकांश लोग आराम को प्राथमिकता देते हैं, वहीं उन्होंने दोबारा मैदान में उतरकर खुद को चुनौती देना चुना। सुबह की ठंडी हवाओं में अभ्यास, लगातार फिटनेस पर काम और हर दिन बेहतर बनने का संकल्प उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया।

कोच बनने के बाद उनके मन में यह सपना और गहराता चला गया कि वे स्वयं भी राष्ट्रीय मंच पर पदक जीतेंगी। कई बार शारीरिक थकान और उम्र की सीमाएं आड़े आईं, लेकिन आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति ने हर बाधा को पीछे छोड़ दिया।

स्वर्ण पदक मिलने का क्षण उनके लिए बेहद भावुक रहा। उनकी आंखों से निकले आंसू वर्षों के परिश्रम, अनुशासन और खुद से किए गए वादों की कहानी कह रहे थे।

अपनी इस ऐतिहासिक उपलब्धि का श्रेय उन्होंने फोर्स अकादमी मँझगवां के संस्थापक डॉ. लाल उमेद सिंह, कोच वसीम, पूरे कोचिंग स्टाफ, अपने परिवार और शुभचिंतकों को दिया। उन्होंने कहा कि यदि उन्हें समय पर सही मार्गदर्शन और भरोसा नहीं मिलता, तो यह सपना अधूरा रह सकता था।

सुनीता सिंह का स्पष्ट संदेश है—
“उम्र सिर्फ शरीर की होती है, सपनों की नहीं।”

उनकी यह उपलब्धि न केवल गौरेला–पेण्ड्रा–मरवाही जिला बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का विषय है।

आज सुनीता सिंह सिर्फ एक खिलाड़ी या कोच नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा हैं जो उम्र या परिस्थितियों के कारण अपने सपनों को पीछे छोड़ देते हैं। उनकी सफलता यह साबित करती है कि यदि मन में जुनून हो और लक्ष्य के प्रति ईमानदारी हो, तो 63 की उम्र में भी सुनहरी उड़ान भरी जा सकती है।