ग्रीनलैंड की सुरक्षा को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच नए समझौते का दावा, रूस-चीन की मौजूदगी पर रोक की बात

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच सुरक्षा समझौते की घोषणा की है। ट्रंप के अनुसार, इस व्यवस्था से अमेरिका को ग्रीनलैंड की सुरक्षा को लेकर स्थायी भूमिका मिलेगी और रूस-चीन समेत अन्य अमेरिकी विरोधियों को वहां सैन्य मौजूदगी या संवेदनशील निवेश से रोका जाएगा। हालांकि, डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने कहा है कि समझौता उनकी संप्रभुता और आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता देता है तथा इसे लागू करने के लिए संसदीय प्रक्रिया जरूरी होगी।

Sep 19, 2026 - 13:59
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ग्रीनलैंड की सुरक्षा को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच नए समझौते का दावा, रूस-चीन की मौजूदगी पर रोक की बात

UNITED NEWS OF ASIA. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 18 सितंबर 2026 को ग्रीनलैंड की सुरक्षा को लेकर अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच एक नए समझौते की घोषणा की। ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया कि इस व्यवस्था के तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड की सुरक्षा और अन्य जरूरतों को लेकर स्थायी भूमिका मिलेगी। उन्होंने इसे अनिश्चितकालीन यानी बिना तय समाप्ति अवधि वाला समझौता बताया। हालांकि, समझौते का पूरा आधिकारिक पाठ अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है और इसे लागू करने के लिए डेनमार्क तथा ग्रीनलैंड की संसदीय प्रक्रियाएं पूरी होना बाकी हैं।

ट्रंप के अनुसार, समझौते के तहत अमेरिका ग्रीनलैंड में अपनी सुरक्षा और सैन्य मौजूदगी को बढ़ाने की दिशा में काम करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका के विरोधी देशों को ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डा स्थापित करने, सैन्य मौजूदगी रखने या संवेदनशील क्षेत्रों में निवेश करने के लिए अमेरिकी मंजूरी की जरूरत होगी। रिपोर्टों के अनुसार, इस व्यवस्था का एक प्रमुख उद्देश्य आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन जैसे देशों की रणनीतिक मौजूदगी को सीमित करना है।

अमेरिका की ग्रीनलैंड में पहले से सैन्य मौजूदगी है। आर्कटिक क्षेत्र में स्थित ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति इसे उत्तर अमेरिका और यूरोप के बीच सुरक्षा एवं रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है। अमेरिका का वहां पिटुफिक स्पेस बेस भी है। नए समझौते के तहत अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को और बढ़ाने की योजनाओं पर काम शुरू करने की बात ट्रंप ने कही है।

हालांकि, ट्रंप के बयान में इस्तेमाल किए गए “स्थायी नियंत्रण” शब्द की व्याख्या को लेकर डेनमार्क और ग्रीनलैंड का रुख अलग है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन और ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नीलसन ने संयुक्त बयान में कहा कि प्रस्तावित समझौता ग्रीनलैंड और डेनमार्क की संप्रभुता तथा ग्रीनलैंड के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता देता है। दोनों पक्षों ने समझौते को आर्कटिक और उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र की सुरक्षा मजबूत करने वाली व्यवस्था के रूप में पेश किया है।

ग्रीनलैंड वर्तमान में डेनमार्क के साम्राज्य के अंतर्गत एक स्वशासित क्षेत्र है। वहां की स्थानीय सरकार को व्यापक घरेलू अधिकार प्राप्त हैं, जबकि रक्षा और विदेश नीति से जुड़े प्रमुख अधिकार डेनमार्क के पास हैं। इसी वजह से अमेरिका की बढ़ती सुरक्षा भूमिका और ग्रीनलैंड की संप्रभुता के बीच संतुलन इस समझौते का महत्वपूर्ण पहलू माना जा रहा है। भारतीय एक्सप्रेस के अनुसार, नई व्यवस्था अमेरिकी सैन्य भूमिका को दीर्घकालिक बनाने की दिशा में है, जबकि डेनमार्क की संप्रभुता बरकरार रहेगी।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि ग्रीनलैंड उत्तर अमेरिका के रणनीतिक रक्षा क्षेत्र का हिस्सा बना रहेगा और समझौता अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं को स्थायी रूप से संबोधित करता है। दूसरी ओर, डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने स्पष्ट किया है कि समझौते को औपचारिक रूप से लागू करने से पहले आवश्यक संसदीय प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। प्रस्तावित समझौते पर अगले सप्ताह न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान औपचारिक हस्ताक्षर होने की योजना बताई गई है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब ट्रंप पहले भी ग्रीनलैंड को अमेरिकी नियंत्रण में लेने की इच्छा सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर चुके हैं। मौजूदा समझौते की घोषणा में हालांकि ग्रीनलैंड का अमेरिका में विलय या डेनमार्क से उसकी संप्रभुता का हस्तांतरण शामिल नहीं बताया गया है। इसलिए फिलहाल इसका मुख्य प्रभाव सुरक्षा सहयोग, अमेरिकी सैन्य मौजूदगी और आर्कटिक क्षेत्र में रणनीतिक गतिविधियों से जुड़ा दिखाई देता है। समझौते का अंतिम स्वरूप और इसकी वास्तविक शर्तें औपचारिक दस्तावेज तथा संसदीय मंजूरी के बाद अधिक स्पष्ट होंगी।