नेतृत्ववीहिन कांग्रेस खोज रही संजीवनी या फिर गवा रही गोल्ड़न मौका
कवर्धा की राजनीति इन दिनों किसी सीरियल से कम नहीं हर किरदार खुद को हीरो समझ रहा है, और जनता रिमोट लेकर चैनल बदलने की सोच में है।
कहानी शुरू होती है 2023 के विधानसभा चुनाव से, जब मोहम्मद अकबर के पास पूरा “गोल्डन चांस” था। कार्यकर्ताओं की फौज, सत्ता का साथ और अनुभव सब कुछ मौजूद। लेकिन अंदरखाने ऐसी खींचतान चली कि मौका हाथ से ऐसे फिसला जैसे बारिश में साबुन।
उधर विजय शर्मा एक विकल्प बनकर उभरे और जनता ने भी बिना ज्यादा सोचे “चेंज” का बटन दबा दिया। नतीजा अकबर साहब राजनीति के मैदान से ऐसे आउट हुए कि ढाई साल बाद भी “कमबैक ट्रेलर” रिलीज नहीं हो पाया।
सबसे मजेदार तो वो “नवरत्न” हैं, जो कभी अकबर के आस-पास ऐसे घूमते थे जैसे ग्रह सूर्य के चारों ओर। लेकिन जैसे ही सत्ता गई, ये नवरत्न भी ऐसे गायब हुए मानो डेटोल से नहाकर कीटाणु भाग जाते हैं। अब कुछ राजनीति छोड़ चुके हैं, तो कुछ ने नया दरबार ढूंढ लिया।
कांग्रेस की हालत तो और दिलचस्प है नेतृत्व ऐसा कि हर गली में एक “स्वघोषित विधायक प्रत्याशी” मिल जाएगा। कोई खुद को अगला विधायक बता रहा है, तो कोई अपनी अलग टीम बनाकर “मिनी कांग्रेस” चला रहा है। पार्टी कम, फ्रेंचाइज़ी ज्यादा लगने लगी है।
कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी कम नहीं। पहले बीजेपी से आए लोगों को आगे बैठाया गया, अब पुराने कार्यकर्ता डर रहे हैं कि अगर अकबर लौटे तो फिर वही पुरानी टीम “री-रिलीज” हो जाएगी और मेहनत करने वाले फिर बैकग्राउंड डांसर बनकर रह जाएंगे।
उधर जनता चाहती थी कि कांग्रेस एक मजबूत विपक्ष बने जैसे झंडा कांड कवर्धा के समय बीजेपी ने भूमिका निभाई थी। लेकिन कांग्रेस अभी भी “ज्ञापन दो और फोटो खिंचवाओ” मोड में अटकी हुई है, और असली लड़ाई व्हाट्सऐप और फेसबुक पर लड़ी जा रही है।
इसी बीच “युवा मित्र मंडल” जैसे नए संगठन एंट्री मारकर सैकड़ों की रैली निकाल देते हैं और जनता को ये मैसेज दे जाते हैं कि “भाई, विपक्ष अगर सो रहा है तो हम हैं ना।”
अब सबसे बड़ा सवाल वही क्या मोहम्मद अकबर वापसी करेंगे?
या फिर कांग्रेस ऐसे ही “हर कोई नेता, कोई नहीं नेतृत्व” वाली स्थिति में अगला चुनाव भी ट्रायल वर्जन की तरह खेलती रहेगी?
कवर्धा की जनता फिलहाल यही सोच रही है
“यहाँ नेता इतने हैं कि अगर सबको टिकट दे दिया जाए, तो विपक्ष में बैठने की जगह भी कम पड़ जाएगी।”
खबर जारी है…