गायता जोहरनी पर्व में दिखी आदिवासी संस्कृति की अनोखी झलक, हजारों समाजजन हुए शामिल

कोंडागांव जिले के फरसगांव ब्लॉक के ग्राम गट्टीपलना में ब्लॉक स्तरीय गायता जोहरनी पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों और उत्साह के साथ मनाया गया। आयोजन में हजारों समाजजन शामिल हुए। पारंपरिक वेशभूषा, मांदरी और रेला नृत्य, गीत-संगीत तथा नई फसल से जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों ने आदिवासी संस्कृति की समृद्ध तस्वीर प्रस्तुत की।

Oct 4, 2026 - 18:43
 0  2
गायता जोहरनी पर्व में दिखी आदिवासी संस्कृति की अनोखी झलक, हजारों समाजजन हुए शामिल

UNITED NEWS OF ASIA. रामकुमार भारद्वाज, कोंडागांव l बस्तर में निवासरत आदिवासी समाज आज भी अपने पुरखों की विशिष्ट रीति-रिवाज, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को पूरी आस्था के साथ सहेजे हुए है। यहां मनाए जाने वाले पर्वों में प्रकृति, देवी-देवताओं और पूर्वजों के प्रति गहरी आस्था देखने को मिलती है। इसी परंपरा से जुड़ा गायता जोहरनी पर्व इस वर्ष कोंडागांव जिले के फरसगांव ब्लॉक के ग्राम गट्टीपलना के पटेलपारा में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। ब्लॉक स्तरीय आयोजन में हजारों की संख्या में समाजजन शामिल हुए।

आदिवासी समाज में गांव के गायता का विशेष धार्मिक और सामाजिक महत्व माना जाता है। गांव में होने वाले सामाजिक एवं धार्मिक कार्यों में गायता की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। जन्म, विवाह, सुख-दुख और कृषि कार्यों से जुड़ी परंपराओं में भी गायता के निर्देशों और रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है।

आदिवासी समाज का मुख्य व्यवसाय कृषि और पशुपालन है। परंपरा के अनुसार खेत में सबसे पहले बीज बोने की शुरुआत गायता द्वारा की जाती है। इसके बाद ग्रामीण अपने-अपने खेतों में बुआई का कार्य शुरू करते हैं। नई फसल तैयार होने के बाद सबसे पहले देवी-देवताओं और पुरखों को नई फसल अर्पित की जाती है। इसके बाद नवाखानी महापर्व और फिर गायता जोहरनी पर्व मनाने की परंपरा है।

गोंडवाना समाज समन्वयक समिति फरसगांव के ब्लॉक अध्यक्ष छेरकु राम नेताम ने बताया कि गायता जोहरनी पर्व के दौरान नई फसल से विभिन्न प्रकार के पकवान और भोजन तैयार किए जाते हैं। सबसे पहले इन्हें देवी-देवताओं को अर्पित किया जाता है। इसके बाद समाज के लोग सामूहिक भोज करते हैं और पारंपरिक गीत एवं नृत्य के माध्यम से अपनी संस्कृति का उत्सव मनाते हैं।

गट्टीपलना में आयोजित ब्लॉक स्तरीय समारोह में फरसगांव क्षेत्र के विभिन्न गांवों से बड़ी संख्या में समाजजन पहुंचे। पारंपरिक नर्तक दलों ने भी आयोजन में हिस्सा लिया। रंग-बिरंगी पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचे लोगों ने मांदरी नृत्य, रेला नृत्य और पारंपरिक गीतों की प्रस्तुति दी। नगाड़ा और ढोल की थाप के बीच हुए सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने पूरे आयोजन में उत्साह और उमंग का माहौल बना दिया।

समाज के लोगों का कहना है कि आदिवासी समाज अपनी विशिष्ट संस्कृति, कला और परंपराओं के लिए अलग पहचान रखता है। ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

बस्तर के आदिवासी समाज के जीवन में जंगल और वन उपज का भी विशेष महत्व है। जन्म, विवाह और विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक परंपराओं में पेड़-पौधों और पत्तों का उपयोग किया जाता है। गायता जोहरनी पर्व में भी कोड़ई पत्ते का उपयोग प्रसाद ग्रहण करने के लिए किया जाता है। समाज के अनुसार कोड़ई पत्ते को औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है। नवाखानी और गायता जोहरनी पर्व के दौरान इसी पत्ते में चिवड़ा सहित अन्य प्रसाद ग्रहण करने की परंपरा है।

ग्राम गट्टीपलना में आयोजित इस समारोह ने आदिवासी समाज की सांस्कृतिक एकता, प्रकृति के प्रति जुड़ाव और पुरखों से चली आ रही परंपराओं की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत की। समारोह में शामिल हजारों समाजजनों ने अपनी संस्कृति और विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प भी दोहराया।