Diesel-CNG Cars: ट्रक और बसों में चल रहा डीजल-CNG कॉम्बिनेशन, फिर आम कारों में क्यों नहीं दिखता?

डीजल-CNG डुअल-फ्यूल तकनीक भारी व्यावसायिक वाहनों में इस्तेमाल की जा सकती है, लेकिन पैसेंजर कारों में यह अभी आम विकल्प नहीं बनी है। इसका मुख्य कारण डीजल इंजन का compression-ignition सिद्धांत, CNG को जलाने के लिए डीजल पायलट फ्यूल की जरूरत, अतिरिक्त फ्यूल सिस्टम और कंट्रोल की जटिलता, गैस स्टोरेज के लिए अधिक जगह तथा लागत और उपयोग के हिसाब से आर्थिक व्यवहार्यता है। शोध में इस तकनीक के संभावित फायदे और कुछ सीमाएं दोनों सामने आई हैं।

Sep 16, 2026 - 13:48
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Diesel-CNG Cars: ट्रक और बसों में चल रहा डीजल-CNG कॉम्बिनेशन, फिर आम कारों में क्यों नहीं दिखता?

UNITED NEWS OF ASIA. भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में CNG को कम ईंधन लागत और बेहतर माइलेज के लिए जाना जाता है। लेकिन सड़क पर दिखाई देने वाली ज्यादातर CNG पैसेंजर कारें पेट्रोल आधारित स्पार्क-इग्निशन इंजन का इस्तेमाल करती हैं। दूसरी ओर, डीजल-CNG डुअल-फ्यूल तकनीक पर लंबे समय से भारी वाहनों के लिए शोध और विकास होता रहा है। सवाल यह है कि अगर डीजल और CNG को एक ही इंजन में इस्तेमाल किया जा सकता है, तो यह तकनीक आम पैसेंजर कारों में व्यापक रूप से क्यों नहीं दिखाई देती? इसका जवाब इंजन की तकनीक और पूरे सिस्टम की लागत में छिपा है।

सबसे पहले पेट्रोल और डीजल इंजन के काम करने के तरीके को समझना जरूरी है। पेट्रोल इंजन में हवा और ईंधन के मिश्रण को स्पार्क प्लग की चिंगारी से प्रज्वलित किया जाता है। डीजल इंजन में स्पार्क प्लग की जगह compression ignition का सिद्धांत काम करता है। इसमें हवा को काफी दबाया जाता है और फिर डीजल ईंधन इंजेक्ट होने पर वह गर्म संपीड़ित हवा के कारण खुद प्रज्वलित होता है। CNG की प्रकृति ऐसी है कि सामान्य डीजल इंजन में केवल compression के जरिए इसे विश्वसनीय तरीके से जलाना आसान नहीं होता।

यहीं से डीजल-CNG डुअल-फ्यूल तकनीक की जरूरत सामने आती है। इस व्यवस्था में CNG को मुख्य ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन थोड़ी मात्रा में डीजल को ‘पायलट फ्यूल’ के रूप में इंजेक्ट किया जाता है। यह डीजल compression के कारण पहले प्रज्वलित होता है और फिर उसके जरिए CNG और हवा के मिश्रण का दहन शुरू होता है। यानी सिस्टम पूरी तरह CNG पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि डीजल और CNG दोनों की भूमिका होती है।

भारी वाहनों में इस तकनीक का फायदा इसलिए अधिक दिखाई देता है क्योंकि ट्रक और बसें लंबे समय तक और ज्यादा दूरी तक चलती हैं। ऐसे वाहनों में ईंधन की बचत शुरुआती तकनीकी निवेश की भरपाई करने में मदद कर सकती है। ARAI से जुड़े शोध में भी डीजल-CNG डुअल-फ्यूल तकनीक को विशेष रूप से heavy-duty applications के लिए विकसित किए जाने का उल्लेख है। शोध में इसके संभावित लाभों के साथ तकनीकी सीमाओं और विकास संबंधी चुनौतियों पर भी चर्चा की गई है।

पैसेंजर कार में तस्वीर अलग हो जाती है। डीजल इंजन को डुअल-फ्यूल बनाने के लिए CNG स्टोरेज, हाई-प्रेशर फ्यूल लाइन, प्रेशर रेगुलेशन, गैस मीटरिंग और इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल जैसी अतिरिक्त व्यवस्थाओं की जरूरत पड़ सकती है। इंजन को अलग-अलग लोड और परिस्थितियों में डीजल तथा गैस के अनुपात को नियंत्रित करना होता है। इसका मतलब है कि सिस्टम की इंजीनियरिंग और कैलिब्रेशन साधारण पेट्रोल-CNG सेटअप की तुलना में अधिक जटिल हो सकती है।

एक और बड़ी चुनौती CNG के भंडारण की है। गैस की ऊर्जा घनत्व को ध्यान में रखते हुए समान ऊर्जा के लिए स्टोरेज सिस्टम को अधिक जगह की जरूरत पड़ सकती है। पैसेंजर कार में यह सीधे बूट स्पेस, वाहन के वजन और पैकेजिंग पर असर डाल सकता है। शोध में भी CNG की कम घनत्व के कारण वाहन में ईंधन भंडारण को महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग चुनौती बताया गया है।

इसके अलावा डुअल-फ्यूल इंजन में कम लोड पर दहन और उत्सर्जन को नियंत्रित करना भी चुनौती हो सकता है। तकनीकी अध्ययनों में डुअल-फ्यूल सिस्टम के साथ कुछ परिस्थितियों में CO और HC उत्सर्जन तथा दक्षता से जुड़ी समस्याओं का उल्लेख किया गया है। यही कारण है कि केवल ईंधन की कीमत कम होना किसी तकनीक को पैसेंजर कार के लिए व्यावसायिक रूप से सफल बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है।

इसलिए डीजल-CNG तकनीक का पैसेंजर कारों में कम दिखना यह नहीं बताता कि तकनीक काम नहीं करती। बल्कि इसका संबंध इंजन की जटिलता, स्टोरेज, उत्सर्जन नियंत्रण, वाहन पैकेजिंग और कुल लागत से है। भारी वाहनों की ज्यादा रनिंग में इसका आर्थिक लाभ अधिक स्पष्ट हो सकता है, जबकि आम कारों में निर्माता के लिए सरल और पहले से स्थापित CNG-पेट्रोल तकनीक अधिक व्यावहारिक विकल्प बनी हुई है।