छत्तीसगढ़ में धान की खेती के तकनीकी सत्यापन के लिए हुआ एमओयू, उपार्जन व्यवस्था होगी और पारदर्शी

छत्तीसगढ़ में धान की खेती के वास्तविक रकबे का सटीक और तकनीक आधारित आकलन करने के लिए खाद्य विभाग और छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के बीच समझौता ज्ञापन हुआ। इसके तहत सेटेलाइट मैपिंग, डिजिटल क्रॉप सर्वे और भू-स्थानिक डेटा का उपयोग किया जाएगा। वन अधिकार अधिनियम और डुबान क्षेत्रों में डिजिटल रूप से मैप नहीं हुए कृषि क्षेत्रों की पहचान कर जीआईएस आधारित पॉलीगॉन लेयर तैयार की जाएगी। इससे धान उपार्जन व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और सुदृढ़ बनाने में मदद मिलेगी।

Sep 23, 2026 - 18:18
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छत्तीसगढ़ में धान की खेती के तकनीकी सत्यापन के लिए हुआ एमओयू, उपार्जन व्यवस्था होगी और पारदर्शी

UNITED NEWS OF ASIA. अमृतेश्वर सिंह, रायपुर। छत्तीसगढ़ में धान की खेती के क्षेत्रफल का सटीक, पारदर्शी और तकनीक आधारित आकलन करने की दिशा में राज्य शासन ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। मंत्रालय महानदी भवन में खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण संचालनालय तथा छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। इस एमओयू का उद्देश्य सेटेलाइट आधारित मैपिंग, डिजिटल क्रॉप सर्वे और भू-स्थानिक डेटा के बेहतर समन्वय के माध्यम से धान उपार्जन व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और सुदृढ़ बनाना है।

समझौते के तहत ऐसे गैर-जियो-रेफरेंस्ड क्षेत्रों की मैपिंग की जाएगी, जो वर्तमान में डिजिटल रूप से मैप नहीं हैं। विशेष रूप से वन अधिकार अधिनियम के तहत आबंटित भू-भागों और डुबान क्षेत्रों में स्थित कृषि भूमि की पहचान की जाएगी। इन क्षेत्रों की जीआईएस आधारित पॉलीगॉन लेयर तैयार की जाएगी, जिससे कृषि भूमि का डिजिटल रिकॉर्ड और अधिक व्यवस्थित किया जा सके।

खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 के लिए तैयार की जाने वाली पॉलीगॉन लेयर और उपलब्ध भू-स्थानिक डेटा के आधार पर धान की फसल के वास्तविक रकबे का आकलन किया जाएगा। इससे धान की खेती वाले क्षेत्रों की पहचान अधिक सटीक तरीके से करने में सहायता मिलेगी और उपार्जन व्यवस्था के लिए तकनीकी आधार मजबूत होगा।

इस प्रक्रिया में सेटेलाइट इमेजरी का भी उपयोग किया जाएगा। अन्य जियो-रेफरेंस्ड क्षेत्रों में भूमि खंडों यानी खसरों के अक्षांश और देशांतर का सेटेलाइट इमेजरी से मिलान कर संबंधित क्षेत्र में धान की फसल की डिजिटल उपस्थिति का सत्यापन किया जाएगा। इस तकनीकी प्रक्रिया से फसल क्षेत्र के आकलन में पारदर्शिता बढ़ाने में मदद मिलेगी।

दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में स्थित कृषि भूमि की डिजिटल पहचान को मजबूत करना भी इस पहल का प्रमुख उद्देश्य है। विशेष रूप से वन अधिकार अधिनियम और डुबान क्षेत्रों की कृषि भूमि के संबंध में डिजिटल क्रॉप सर्वे के लिए एक मजबूत आधार ढांचा तैयार किया जाएगा। इससे धान की खेती के वास्तविक रकबे के तकनीकी सत्यापन की प्रक्रिया को व्यवस्थित करने में सहायता मिलेगी।

राज्य शासन की इस पहल से धान उपार्जन व्यवस्था में उपलब्ध आंकड़ों के बेहतर उपयोग की दिशा में काम होगा। सेटेलाइट इमेजरी, जीआईएस आधारित मैपिंग और भू-स्थानिक डेटा के समन्वय से फसल क्षेत्र की पहचान और सत्यापन को तकनीक आधारित बनाया जाएगा।

इस अवसर पर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा, खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग की सचिव रीना बाबा साहेब कंगाले, खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग की संचालक फरिहा आलम तथा छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के संचालक कवीश्वर उपस्थित रहे।