शर्मिला टैगोर ने ‘वंदे मातरम’ के बाद के छंदों में हिंदू देवी-देवताओं से जुड़े संदर्भों का उल्लेख करते हुए शुरुआती दो छंदों को ही बनाए रखने की बात कही थी। उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा था कि एक ईश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए बाद के कुछ संदर्भों को स्वीकार करना कठिन हो सकता है। उनका यह बयान सामने आने के बाद कंगना रनौत ने इस पर आपत्ति जताई।
कंगना रनौत ने शर्मिला टैगोर के बयान वाले वीडियो को अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर साझा करते हुए कहा कि वह उनके विचार सामने रखने से खुश हैं, लेकिन एक कलाकार के तौर पर उन्हें कला और कविता को लेकर ऐसी सोच पर आश्चर्य है। कंगना ने तर्क दिया कि कविता और गीतों में शब्दों का इस्तेमाल अक्सर रूपक के तौर पर किया जाता है और रचनाकार प्रभाव पैदा करने के लिए कल्पनाओं का सहारा लेते हैं।
कंगना ने अपनी प्रतिक्रिया में स्वामी विवेकानंद के विचारों का उदाहरण देते हुए कहा कि जब वे युवाओं की शक्ति और ऊर्जा का वर्णन करते थे तो उनका उद्देश्य शाब्दिक अर्थ में शरीर का वर्णन करना नहीं था, बल्कि युवा शक्ति का आह्वान करना था। इसी संदर्भ में उन्होंने शर्मिला टैगोर से हिंदू-मुस्लिम सोच से बाहर निकलकर व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की अपील की।
यह विवाद कांग्रेस वर्किंग कमेटी के उस निर्णय के बाद और बढ़ा है, जिसमें कांग्रेस के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती दो छंद गाने की परंपरा को बनाए रखने की बात सामने आई है। इस फैसले को लेकर बीजेपी कांग्रेस पर सवाल उठा रही है, जबकि कांग्रेस की ओर से इसे ऐतिहासिक प्रस्ताव से जोड़कर देखा जा रहा है।
इससे पहले स्वतंत्रता दिवस के मौके पर भी ‘वंदे मातरम’ को लेकर राजनीतिक विवाद सामने आया था। बीजेपी ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और पार्टी की संसदीय अध्यक्ष सोनिया गांधी पर राष्ट्रगीत के दौरान बातचीत करने का आरोप लगाते हुए आपत्ति जताई थी। कांग्रेस ने इसे महज संयोग बताया था। इसके बाद गोवा में कांग्रेस की बैठक के दौरान राष्ट्रगीत के शुरुआती दो छंद गाए जाने की बात सामने आई।
‘वंदे मातरम’ को लेकर जारी बहस अब केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि फिल्म और कला जगत से जुड़े लोगों की राय भी सामने आ रही है। शर्मिला टैगोर और कंगना रनौत के बयानों के बाद राष्ट्रगीत के धार्मिक संदर्भ, साहित्यिक अभिव्यक्ति और राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर चर्चा और तेज हो गई है।