मासूमों के हाथों में अपराध का जहर: बढ़ती नाबालिग आपराधिक घटनाएं समाज और व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती
रायगढ़ में नाबालिगों से जुड़ी एक कथित हत्या की घटना के बाद बच्चों में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। UNA News छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से महेंद्र अग्रवाल ने अपने विचार लेख में किशोर अपराध के सामाजिक, पारिवारिक और कानूनी पहलुओं पर चिंता जताई है। लेख में किशोर न्याय व्यवस्था की समीक्षा, परिवारों की भूमिका, शिक्षा, काउंसलिंग और समाज सुधार के प्रयासों को जरूरी बताया गया है।
UNITED NEWS OF ASIA. महेंद्र अग्रवाल, रायगढ़ l बच्चों के हाथों में किताबों और सपनों की जगह यदि अपराध के हथियार दिखाई देने लगें, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि पूरे समाज के भविष्य का गंभीर सवाल बन जाता है। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में नाबालिगों से जुड़ी एक युवक की हत्या की घटना ने समाज को झकझोर दिया है। घटना को लेकर सामने आए विवरणों के अनुसार, मामूली रकम और बिरयानी के विवाद में चार नाबालिगों पर युवक की हत्या का आरोप है। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह घटना किशोरों में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति और सामाजिक संवेदनहीनता पर गंभीर चिंता पैदा करती है।
पिछले कुछ वर्षों में अलग-अलग स्थानों से नाबालिगों की आपराधिक मामलों में संलिप्तता की खबरें सामने आती रही हैं। हत्या, मारपीट, लूट, चाकूबाजी, अपहरण और अन्य गंभीर अपराधों में किशोरों के शामिल होने की घटनाएं कई सवाल खड़े करती हैं। मोबाइल और इंटरनेट तक कम उम्र में पहुंच, हिंसक सामग्री का प्रभाव, गलत संगति और सामाजिक दबाव जैसे कारकों की भूमिका पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। हालांकि, हर घटना के पीछे अलग परिस्थितियां होती हैं और बिना अध्ययन किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
भारत में किशोर न्याय व्यवस्था का मूल उद्देश्य कानून से संघर्ष करने वाले बच्चों को सुधारने और समाज की मुख्यधारा में वापस लाने का अवसर देना है। किशोर न्याय अधिनियम में बच्चों की उम्र, अपराध की प्रकृति और परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग प्रावधान किए गए हैं। लेकिन गंभीर अपराधों में नाबालिगों की संलिप्तता सामने आने पर यह बहस तेज हो जाती है कि मौजूदा व्यवस्था सुधार और जवाबदेही के बीच कितना प्रभावी संतुलन बना पा रही है। कानून में बदलाव की मांग के साथ यह समझना भी जरूरी है कि किशोरों के अधिकारों और उनके पुनर्वास की संवैधानिक भावना को कमजोर किए बिना पीड़ितों को न्याय कैसे मिले।
इस समस्या की जड़ें केवल कानून तक सीमित नहीं हैं। परिवार, स्कूल और समाज की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में माता-पिता आजीविका की जिम्मेदारियों के कारण बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते। स्कूल से दूरी, नशे की उपलब्धता, गलत संगति और निगरानी का अभाव बच्चों को जोखिमपूर्ण परिस्थितियों में पहुंचा सकता है। दूसरी ओर, केवल गरीबी या किसी विशेष बस्ती को अपराध से जोड़ना भी उचित नहीं है। बच्चों के व्यवहार और परिस्थितियों को समझने के लिए संवेदनशील तथा व्यापक दृष्टिकोण जरूरी है।
बच्चों को अपराध से दूर रखने के लिए परिवारों में संवाद, स्कूलों में नैतिक और व्यवहारिक शिक्षा, खेलकूद, कौशल प्रशिक्षण और नियमित काउंसलिंग को बढ़ावा देना होगा। पुलिस, बाल कल्याण समितियों, सामाजिक संस्थाओं और शिक्षा विभाग के बीच बेहतर समन्वय भी आवश्यक है। बाल सुधार गृहों में केवल निगरानी नहीं, बल्कि शिक्षा, मनोवैज्ञानिक सहायता और पुनर्वास की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि बच्चे दोबारा अपराध की राह पर न लौटें।
गंभीर अपराधों में जवाबदेही तय करना और पीड़ितों को न्याय दिलाना जरूरी है, लेकिन इसके साथ किशोरों के सुधार और पुनर्वास की व्यवस्था भी प्रभावी होनी चाहिए। सरकार, न्यायपालिका, कानून निर्माता, अभिभावक और समाज को मिलकर इस चुनौती का सामना करना होगा। आज बच्चों को सही दिशा, सुरक्षित वातावरण और जिम्मेदार मार्गदर्शन देने में असफल रहे, तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ सकता है।