पुनांग तिन्दाना पंडूम में गूंजा प्रकृति, परंपरा और पुरखों से जुड़ाव का संदेश
कांकेर के ग्राम कुलगांव में पुनांग तिन्दाना पंडूम यानी नवा खाई परब और गायता-ठाकुर जोहारनी का पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। ग्रामीणों ने नए अन्न की पहली उपज पुरखों को अर्पित कर प्रकृति के प्रति कृतज्ञता जताई और नई पीढ़ी को भाषा, संस्कृति, परंपरा व पारंपरिक ज्ञान से जोड़ने का संदेश दिया।
UNITED NEWS OF ASIA. राजेन्द्र मंडावी, कांकेर l ग्राम कुलगांव में पुनांग तिन्दाना पंडूम यानी नवा खाई परब एवं गायता-ठाकुर जोहारनी का पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों, सामाजिक एकता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता की भावना के साथ हर्षोल्लास से मनाया गया। पर्व के दौरान ग्रामीणों ने पुरखों से चली आ रही परंपराओं का विधिवत पालन किया। आयोजन के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी भाषा, संस्कृति, सामाजिक परंपराओं और पारंपरिक ज्ञान से जोड़ने का संदेश भी दिया गया।
पुनांग तिन्दाना पंडूम को केवल नए अन्न के सेवन से जुड़ा पर्व नहीं माना जाता, बल्कि यह प्रकृति, समाज और पुरखों के साथ पारंपरिक संबंधों को स्मरण करने का अवसर भी है। ग्रामीणों के अनुसार, यह पर्व प्रकृति से प्राप्त संसाधनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और पुरखों से मिली ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने की सीख देता है। बदलते समय में सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिए ऐसी परंपराओं का संरक्षण महत्वपूर्ण माना जाता है।
पर्व के प्रथम दिवस ग्राम के परिवारों ने अपने-अपने पुरखा अथवा इष्ट देव को नए चावल की पहली उपज अर्पित की। इसके बाद परिवार के सदस्यों ने प्रसाद स्वरूप नए अन्न का भोग ग्रहण किया। इस परंपरा के माध्यम से प्रकृति से प्राप्त प्रथम अन्न को पहले पुरखों को समर्पित करने की सदियों पुरानी मान्यता का पालन किया गया। परिवारों ने इस दौरान अपने पूर्वजों को स्मरण करते हुए उनके द्वारा स्थापित परंपराओं और जीवन मूल्यों के प्रति सम्मान व्यक्त किया।
पर्व के दूसरे दिन गायता-ठाकुर जोहारनी का आयोजन किया गया। ग्राम के प्रथम व्यक्ति, गायता, जिम्मेदारिन माता के सेवक और ग्राम पटेल की उपस्थिति में पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार जोहारनी की रस्म पूरी की गई। इस दौरान ग्रामीणों ने एक-दूसरे को पर्व की शुभकामनाएं दीं और सामाजिक एकता, भाईचारे तथा आपसी सहयोग को मजबूत बनाए रखने का संकल्प लिया।
ग्रामीणों ने बताया कि पुनांग तिन्दाना पंडूम की विशेषता यह है कि इसमें नई पीढ़ी केवल पर्व की रस्मों में शामिल नहीं होती, बल्कि बुजुर्गों से भाषा, संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का ज्ञान भी प्राप्त करती है। बुजुर्गों द्वारा अनुभवों और परंपराओं की जानकारी बच्चों तथा युवाओं तक पहुंचाने से सांस्कृतिक ज्ञान के हस्तांतरण की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
ग्रामीणों का कहना है कि आधुनिक और बदलते सामाजिक परिवेश में अपनी भाषा, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान को सुरक्षित रखना प्रत्येक पीढ़ी की जिम्मेदारी है। पुरखों की परंपराओं को केवल उत्सव के रूप में मनाने के बजाय उनके पीछे छिपे सामाजिक और पर्यावरणीय संदेश को समझना भी जरूरी है। इससे आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने में मदद मिल सकती है।
ग्राम कुलगांव में आयोजित पर्व के दौरान जल-जंगल-जमीन, प्रकृति, पुरखा और समाज के पारंपरिक संबंधों को मजबूत करने का संदेश दिया गया। पूरे गांव में उत्साह, उमंग और सामाजिक सौहार्द का वातावरण रहा। पर्व ने ग्रामीणों को अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर दिया। आयोजन का संदेश रहा कि प्रकृति से सीखें, पुरखों से जुड़ें, परंपरा को समझें और आने वाली पीढ़ी तक ज्ञान का हस्तांतरण करें।