जलवायु संकट पर पीएम मोदी का बड़ा बयान, बोले- विकासशील देशों पर उत्सर्जन का बोझ डालना उचित नहीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में जलवायु संकट और पर्यावरण संरक्षण को लेकर भारत के दृष्टिकोण पर बात की। उन्होंने कहा कि भारत की सभ्यता में प्रकृति संरक्षण की परंपरा रही है और विकासशील देशों पर उत्सर्जन की जिम्मेदारी का अतिरिक्त बोझ डालना उचित नहीं है। इस अवसर पर उन्होंने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) का मोबाइल ऐप भी लॉन्च किया। सम्मेलन में 17 देशों के न्यायिक प्रतिनिधि और पर्यावरण विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे हैं।

Sep 19, 2026 - 15:17
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जलवायु संकट पर पीएम मोदी का बड़ा बयान, बोले- विकासशील देशों पर उत्सर्जन का बोझ डालना उचित नहीं

UNITED NEWS OF ASIA. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित ‘द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स’ विषयक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर भारत का दृष्टिकोण सामने रखा। उन्होंने कहा कि भारत की सभ्यता और संस्कृति में प्रकृति तथा पर्यावरण के संरक्षण की परंपरा सदियों पुरानी है। प्रधानमंत्री के अनुसार, इसी अनुभव और परंपरा के आधार पर भारत आधुनिक दौर की जलवायु चुनौतियों के समाधान में अपना योगदान बढ़ा रहा है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण को लेकर भारत की सोच किसी नई अवधारणा पर आधारित नहीं है। उन्होंने देश की दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत मौजूदा पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। उनके मुताबिक जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ रहा है और इससे निपटने के लिए विभिन्न देशों के बीच सहयोग तथा साझा प्रयास जरूरी हैं।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी NGT का मोबाइल ऐप भी लॉन्च किया। इस ऐप को पर्यावरण से जुड़े मामलों और अधिकरण की गतिविधियों तक डिजिटल पहुंच को सुविधाजनक बनाने की दिशा में एक पहल के तौर पर पेश किया गया। प्रधानमंत्री ने पर्यावरणीय शासन और कानून से जुड़े तंत्र को तकनीक के माध्यम से अधिक सुलभ बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में विकासशील देशों की भूमिका पर बात करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि कार्बन उत्सर्जन की जिम्मेदारी का बोझ विकासशील देशों पर डालना उचित नहीं है। उन्होंने भारत के प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन का उल्लेख करते हुए कहा कि यह वैश्विक औसत के आधे से भी कम है। प्रधानमंत्री ने विकसित देशों के प्रति व्यक्ति उत्सर्जन की तुलना करते हुए कहा कि कई विकसित देशों में यह भारत की तुलना में कई गुना अधिक है। इस आधार पर उन्होंने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर जिम्मेदारियों के संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता बताई।

प्रधानमंत्री ने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की प्रगति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने पर्यावरण संरक्षण के विभिन्न क्षेत्रों में काम किया है और स्वच्छ तथा नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दिया है। उन्होंने पेरिस जलवायु समझौते के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं, गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता, सौर ऊर्जा और उत्सर्जन से संबंधित लक्ष्यों का भी जिक्र किया।

यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 19 और 20 सितंबर को आयोजित किया जा रहा है। इसमें पर्यावरण विशेषज्ञों के अलावा भारत के न्यायिक और सरकारी क्षेत्र के प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं। सम्मेलन में 17 देशों के न्यायाधीश और न्यायिक प्रतिनिधि भी हिस्सा ले रहे हैं। आयोजन का उद्देश्य पर्यावरणीय शासन, जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण कानून और उससे जुड़ी चुनौतियों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विचार-विमर्श तथा अनुभवों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देना है।

सम्मेलन के माध्यम से पर्यावरणीय कानून और न्यायिक प्रक्रियाओं से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की जा रही है। जलवायु परिवर्तन की बदलती परिस्थितियों के बीच देशों के सामने मौजूद चुनौतियों और संभावित समाधानों पर भी संवाद का केंद्र रहेगा। भारत की ओर से पर्यावरण संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा और जलवायु प्रतिबद्धताओं से जुड़े प्रयासों को इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर सामने रखा गया।