गुरु पूर्णिमा पर सोनांचल एकेडमी में गुरु-शिष्य परंपरा का भव्य आयोजन

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के पेंड्रा स्थित सोनांचल एकेडमी में गुरु पूर्णिमा का पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। विद्यार्थियों ने गुरुजनों का सम्मान कर भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा को जीवंत किया। कार्यक्रम में जनार्दन प्रसाद श्रीवास ने गुरु के महत्व और भारतीय संस्कृति के मूल्यों पर प्रेरणादायी संदेश दिया।

Jul 30, 2026 - 16:51
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गुरु पूर्णिमा पर सोनांचल एकेडमी में गुरु-शिष्य परंपरा का भव्य आयोजन

UNITED NEWS OF ASIA. अवास कैवर्त, गौरेला पेंड्रा मरवाही l गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के पेंड्रा स्थित सोनांचल एकेडमी में गुरु पूर्णिमा का पर्व श्रद्धा, सम्मान और भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपराओं के साथ हर्षोल्लास से मनाया गया। कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने अपने गुरुजनों का सम्मान कर गुरु-शिष्य परंपरा को साकार रूप दिया। पूरे आयोजन के दौरान विद्यालय परिसर में श्रद्धा, अनुशासन और सांस्कृतिक मूल्यों का वातावरण देखने को मिला।

कार्यक्रम की शुरुआत गुरु वंदना और दीप प्रज्वलन के साथ हुई। इसके बाद छात्र-छात्राओं ने अपने शिक्षकों को श्रीफल, पेन और पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित किया तथा उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। विद्यार्थियों ने इस अवसर पर गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए भारतीय संस्कृति में गुरु के सर्वोच्च स्थान को रेखांकित किया।

कार्यक्रम के केंद्र में संस्थान के संचालक जनार्दन प्रसाद श्रीवास रहे, जिनके मार्गदर्शन में पूरे समारोह का गरिमापूर्ण आयोजन संपन्न हुआ। विद्यार्थियों ने जनार्दन प्रसाद श्रीवास, अभिषेक शर्मा और नव्या शर्मा का भी श्रीफल, पेन और पुष्पगुच्छ भेंट कर विशेष सम्मान किया। इस अवसर पर श्रद्धा, दिनेश कुमारी, सुलोचनी, डीम कुमारी, अंजना, दिव्या, लवली, प्रतिभा, अनीता, शिल्पी, रानी, कैलाश, रश्मि, प्रीति और शबी सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने भाग लिया।

विद्यार्थियों ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि गुरु केवल शिक्षा ही नहीं देते, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाले सच्चे मार्गदर्शक भी होते हैं। उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा को भारतीय संस्कृति की सबसे महत्वपूर्ण धरोहर बताते हुए इसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का संकल्प भी व्यक्त किया।

अपने संबोधन में जनार्दन प्रसाद श्रीवास ने कहा कि गुरु का स्थान जीवन में सर्वोच्च होता है। गुरु केवल ज्ञान प्रदान नहीं करते, बल्कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व, संस्कार और चरित्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि सनातन काल से चली आ रही गुरु-शिष्य परंपरा हमारी संस्कृति की अमूल्य धरोहर है और आज के आधुनिक दौर में भी इसका महत्व कम नहीं हुआ है।

उन्होंने विद्यार्थियों से नैतिक मूल्यों, अनुशासन, मानवता और गुरुजनों के प्रति सम्मान को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाने का आह्वान किया। उनके प्रेरणादायी उद्बोधन ने उपस्थित विद्यार्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों को भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम का समापन गुरुजनों के आशीर्वाद और भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के संकल्प के साथ हुआ।