दिव्यांग शिक्षक की मिसाल: 7 साल से बिना मानदेय बच्चों को पढ़ा रहे बिमल मरकाम, अब सम्मान की उम्मीद

गरियाबंद जिले के मैनपुर विकासखंड के दूरस्थ ग्राम चिपरी में दिव्यांग युवा बिमल कुमार मरकाम पिछले 6 से 7 वर्षों से बिना किसी मानदेय के बच्चों को पढ़ा रहे हैं। स्कूल में शिक्षकों की कमी के दौरान उन्होंने बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए यह जिम्मेदारी संभाली थी। अब स्कूल में नियमित शिक्षक पदस्थ हैं, इसके बावजूद बिमल बच्चों से लगाव के कारण पढ़ाने के लिए पहुंचते हैं। विकासखंड शिक्षा अधिकारी ने नियमों के अनुसार रिक्त पद होने पर आवेदन लेकर नियुक्ति पर विचार करने की बात कही है।

Sep 16, 2026 - 18:44
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दिव्यांग शिक्षक की मिसाल: 7 साल से बिना मानदेय बच्चों को पढ़ा रहे बिमल मरकाम, अब सम्मान की उम्मीद

UNITED NEWS OF ASIA. राधे पटेल, गरियाबंद l जिले के मैनपुर विकासखंड के सुदूर वनांचल क्षेत्र से शिक्षा के प्रति समर्पण की एक मिसाल सामने आई है। ग्राम पंचायत कोकड़ी के आश्रित ग्राम चिपरी निवासी दिव्यांग युवा बिमल कुमार मरकाम पिछले करीब 6 से 7 वर्षों से बिना किसी वेतन या मानदेय के बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि बच्चों के प्रति लगाव और शिक्षा के प्रति रुचि के कारण उन्होंने यह सिलसिला शुरू किया था, जो वर्षों बाद भी जारी है।

चिपरी गांव मैनपुर ब्लॉक मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर पहाड़ी और वनांचल क्षेत्र में स्थित है। यहां संचालित शासकीय प्राथमिक शाला में एक समय शिक्षकों की कमी के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही थी। ऐसे समय में गांव के ही बिमल कुमार मरकाम आगे आए और बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। उन्होंने किसी आर्थिक लाभ की उम्मीद के बिना बच्चों की पढ़ाई जारी रखने में अपनी भूमिका निभाई।

बताया गया है कि बिमल पिछले कई वर्षों से नियमित रूप से बच्चों के बीच पहुंचकर उन्हें पढ़ाते रहे हैं। उनकी दिव्यांगता के कारण उनके लिए दूसरे प्रकार का मेहनत-मजदूरी वाला काम करना आसान नहीं है। बिमल का कहना है कि उन्हें पढ़ाने के अलावा दूसरा काम नहीं आता और बच्चों के साथ उनका जुड़ाव ही उन्हें लगातार स्कूल तक लेकर आता है। अब स्कूल में नियमित शिक्षकों की पदस्थापना हो चुकी है, इसके बावजूद बच्चों को पढ़ाने के प्रति उनका उत्साह कम नहीं हुआ है।

बिमल की इस सेवा के बदले उन्हें अब तक कोई नियमित मानदेय नहीं मिला है। उनके अनुसार न तो ग्राम पंचायत की ओर से उन्हें आर्थिक सहयोग मिला और न ही शासन-प्रशासन की ओर से उनकी सेवा को किसी नियमित व्यवस्था से जोड़ा गया। वर्षों तक बिना आर्थिक लाभ के बच्चों को पढ़ाने के बावजूद वे अपने स्तर पर शिक्षा की जिम्मेदारी निभाते रहे हैं।

दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षकों की उपलब्धता और बच्चों की नियमित पढ़ाई बड़ी चुनौती होती है। ऐसे क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर किसी व्यक्ति का बच्चों की पढ़ाई के लिए आगे आना महत्वपूर्ण माना जाता है। बिमल का मामला इसी तरह की स्थानीय पहल को सामने लाता है, जहां उन्होंने स्कूल में शिक्षकों की कमी के दौरान बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो, इसके लिए अपनी सेवाएं दीं।

अब बिमल को उम्मीद है कि उनके वर्षों के समर्पण को प्रशासन की ओर से पहचान मिलेगी। उनकी इच्छा है कि शासन उनकी सेवा को देखते हुए उन्हें मानदेय उपलब्ध कराने या सम्मानित करने की दिशा में कोई व्यवस्था करे, ताकि वे सम्मानपूर्वक जीवनयापन कर सकें और शिक्षा के क्षेत्र में अपना योगदान जारी रख सकें।

इस मामले में विकासखंड शिक्षा अधिकारी देवनाथ बघेल ने बताया कि विभाग में गौरव शिक्षा प्रदाता योजना संचालित की जाती है। यदि ब्लॉक में कोई पद रिक्त होता है तो नियमानुसार बिमल का आवेदन लिया जाएगा और उनकी नियुक्ति पर विचार किया जा सकता है। अधिकारी के इस बयान के बाद बिमल के लिए आगे किसी औपचारिक अवसर की उम्मीद बनी है।

बिमल कुमार मरकाम की कहानी यह सवाल भी उठाती है कि दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षों तक निस्वार्थ भाव से शिक्षा देने वाले स्थानीय लोगों की सेवाओं को किस तरह संस्थागत पहचान दी जा सकती है। फिलहाल बिमल को उम्मीद है कि उनके सात वर्षों के प्रयासों को प्रशासन गंभीरता से लेगा और उन्हें उनके योगदान के अनुरूप सम्मान या रोजगार का अवसर मिल सकेगा। वहीं चिपरी के बच्चों के बीच उनका शिक्षा के प्रति यह समर्पण गांव के लिए एक प्रेरक उदाहरण बनकर सामने आया है।