बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक की मांग, दिल्ली HC ने कहा- प्रतिबंध लगाना अदालत के अधिकार में नहीं

बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक या नियंत्रण की मांग वाली जनहित याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को नियंत्रित करना नीतिगत विषय है और इस पर फैसला केन्द्र सरकार को लेना है। कोर्ट ने याचिका को केन्द्र सरकार के समक्ष अभ्यावेदन के रूप में देखने का निर्देश दिया। याचिका में 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक और 13 से 16 वर्ष के बच्चों के लिए अलग नियम बनाने की मांग की गई थी।

Aug 21, 2026 - 13:12
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बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक की मांग, दिल्ली HC ने कहा- प्रतिबंध लगाना अदालत के अधिकार में नहीं

UNITED NEWS OF ASIA. बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक या नियंत्रण की मांग वाली जनहित याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को प्रतिबंधित या नियंत्रित करने का विषय नीतिगत मामला है और इस पर निर्णय लेना केन्द्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह सरकार को सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने या इस संबंध में नई नीति बनाने का निर्देश नहीं दे सकती।

जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत पीएस अरोड़ा की पीठ ने याचिका को केन्द्र सरकार के समक्ष एक अभ्यावेदन के तौर पर देखने का निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि सोशल मीडिया पर बच्चों की पहुंच को लेकर सरकार को सभी संबंधित पहलुओं पर विचार करके उचित निर्णय लेना होगा। हालांकि अदालत ने सरकार को इस संबंध में निर्णय लेने के लिए कोई निश्चित समयसीमा निर्धारित नहीं की।

जनहित याचिका में 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए कानून या दिशा-निर्देश तैयार करने पर विचार करने का केन्द्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने बच्चों को सोशल मीडिया के संभावित दुष्प्रभावों से बचाने के लिए उम्र के आधार पर अलग-अलग नियम बनाने की मांग भी की थी। इसके अलावा 13 से 16 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया कंटेंट को नियंत्रित करने की रूपरेखा तैयार करने की मांग की गई थी।

सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार की ओर से पेश वकील निधि रमन ने कहा कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को नियंत्रित करने का मुद्दा सरकार के स्तर पर विचाराधीन विषय हो सकता है। उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रतिबंध या नियमन के लिए नया कानून बनाने की आवश्यकता पड़ सकती है। सोशल मीडिया पर किसी भी तरह की पाबंदी का व्यापक प्रभाव हो सकता है, इसलिए फैसला लेने से पहले संबंधित पक्षों और हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श जरूरी होगा। केन्द्र सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता की मांग को सरकार के समक्ष अभ्यावेदन के रूप में लिया जा सकता है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने बच्चों की ऑनलाइन निजता और सुरक्षा से जुड़े मौजूदा कानूनी प्रावधानों पर भी जानकारी ली। केन्द्र सरकार की ओर से डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम का हवाला दिया गया। सरकार ने बताया कि इस कानून में बच्चों के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा और ऑनलाइन निजता की सुरक्षा से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं।

याचिकाकर्ता की ओर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चाइल्ड सेक्सुअल अब्यूज मटीरियल यानी CSAM की मौजूदगी को लेकर भी चिंता जताई गई। इस दौरान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म मेटा की ओर से अदालत को बताया गया कि कंपनी अपने प्लेटफॉर्म पर इस तरह की सामग्री की पहचान करने और उसे हटाने के लिए लगातार कदम उठा रही है।

मेटा की ओर से अदालत को बताया गया कि पिछले वर्ष फेसबुक से CSAM से जुड़े करीब छह लाख पोस्ट और इंस्टाग्राम से करीब दो लाख पोस्ट हटाए गए। कंपनी ने कहा कि ऐसे आपत्तिजनक कंटेंट की पहचान और उसे हटाने के लिए प्लेटफॉर्म पर आवश्यक तकनीकी और अन्य उपाय किए जा रहे हैं।

अदालत के इस रुख के बाद बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर किसी तत्काल न्यायिक प्रतिबंध की संभावना फिलहाल नहीं बनी है। अब इस मामले में आगे की कार्रवाई केन्द्र सरकार के स्तर पर होने की उम्मीद है।