जंगल सत्याग्रह के 96 वर्ष: छिंदवाड़ा के ऐतिहासिक लाखनवाड़ी जंगल सत्याग्रह की गाथा

छिंदवाड़ा जिले का लाखनवाड़ी जंगल सत्याग्रह 1930 में ब्रिटिश शासन के दमनकारी वन कानूनों के खिलाफ हुए महत्वपूर्ण आंदोलनों में शामिल था। रामाकोना और खुटांबा क्षेत्र में हुए इस सत्याग्रह में बड़ी संख्या में आदिवासियों और स्वतंत्रता सेनानियों ने भाग लिया। विश्वनाथ दामोदर साल्पेकर, रघुनाथ भोपे और बादल भोई जैसे सेनानियों की भूमिका ने इसे ऐतिहासिक पहचान दिलाई।

Aug 21, 2026 - 09:00
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जंगल सत्याग्रह के 96 वर्ष: छिंदवाड़ा के ऐतिहासिक लाखनवाड़ी जंगल सत्याग्रह की गाथा

UNITED NEWS OF ASIA. यज्ञ राज पटेल, छिंदवाड़ा l भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में छिंदवाड़ा जिले का लाखनवाड़ी जंगल सत्याग्रह साहस, राष्ट्रप्रेम और ब्रिटिश शासन के दमनकारी कानूनों के विरोध का महत्वपूर्ण अध्याय है। वर्ष 1930 में हुए इस जंगल सत्याग्रह को आज 96 वर्ष पूरे हो रहे हैं। रामाकोना और खुटांबा क्षेत्र में हुए इस आंदोलन ने स्थानीय लोगों, विशेषकर आदिवासी समाज में स्वतंत्रता की चेतना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

महात्मा गांधी के नेतृत्व में देशभर में अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन चल रहा था। वर्ष 1920 में नागपुर में आयोजित कांग्रेस के 35वें अधिवेशन का प्रभाव महाकौशल क्षेत्र के जबलपुर और छिंदवाड़ा सहित आसपास के इलाकों में भी पड़ा। वर्ष 1921 में स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेता अली बंधु मोहम्मद अली और शौकत अली के छिंदवाड़ा जेल में रहने से भी क्षेत्र में राजनीतिक जागृति का प्रसार हुआ। इसके बाद 1923 के जबलपुर झंडा सत्याग्रह और 1930 के नमक सत्याग्रह ने युवाओं तथा आदिवासी समाज में राष्ट्रीय चेतना को और मजबूत किया।

अगस्त 1930 में छिंदवाड़ा जिले में जंगल सत्याग्रह के प्रमुख केंद्र रामाकोना और खुटांबा ग्राम बने। रामाकोना से लगभग छह किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत खुटांबा के अंतर्गत नवथल ग्राम के लाखनवाड़ी क्षेत्र में ऐतिहासिक सत्याग्रह हुआ। रामाकोना के रघुनाथ भोपे सत्याग्रह के वॉलेंटियर कमांडर थे। 20 अगस्त 1930 की शाम सत्याग्रहियों ने राष्ट्रभक्ति के नारों के साथ आंदोलन की तैयारी की। अगले दिन सूर्योदय के साथ सत्याग्रहियों का दल रामाकोना से लाखनवाड़ी जंगल की ओर रवाना हुआ।

विश्वनाथ दामोदर साल्पेकर के नेतृत्व में सत्याग्रहियों ने चांदी के हंसिये से घास काटकर ब्रिटिश शासन के वन कानून का शांतिपूर्ण ढंग से उल्लंघन किया। सत्याग्रहियों को 11-11 की टोलियों में बांटा गया था। आंदोलन की तैयारी और व्यवस्थाओं में स्थानीय लोगों ने भी महत्वपूर्ण सहयोग दिया। रामाकोना के तिवारी भवन में जगन्नाथ तिवारी ने प्रशिक्षण शिविर के लिए स्थान उपलब्ध कराया, जबकि माणिकराव चौरे और भोपे बंधुओं ने सत्याग्रहियों के भोजन की व्यवस्था में सहयोग किया।

लाखनवाड़ी जंगल सत्याग्रह में हजारों आदिवासियों की भागीदारी ने इसे व्यापक जनआंदोलन का स्वरूप दिया। 21 अगस्त 1930 को आदिवासी नेता बादल भोई की उपस्थिति में वन कानून का उल्लंघन किया गया। ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए बादल भोई को गिरफ्तार कर चांदा सेंट्रल जेल भेज दिया। जेल में उन्हें कठोर यातनाएं झेलनी पड़ीं और वर्ष 1940 में उन्होंने जेल में ही अपने प्राण त्याग दिए।

सत्याग्रह के बढ़ते प्रभाव से ब्रिटिश सरकार ने दमनात्मक कार्रवाई तेज कर दी। रघुनाथ भोपे को भारतीय दंड विधान की धाराओं के तहत छह माह के कारावास की सजा सुनाई गई। सत्याग्रहियों के प्रशिक्षण के लिए स्थान उपलब्ध कराने के आरोप में जगन्नाथ तिवारी पर 200 रुपये का जुर्माना लगाया गया। ब्रिटिश शासन ने नाबालिग सत्याग्रहियों के साथ भी कठोर व्यवहार किया। 18 वर्ष से कम उम्र के माधवराव बापूजी बेलदार, गणपत गिरधारी बेलदार और आत्माराम घाटोड़ को छिंदवाड़ा जेल में बेंतों की सजा दी गई।

लाखनवाड़ी जंगल सत्याग्रह का प्रभाव लंबे समय तक बना रहा। यह आंदोलन स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी समाज की सक्रिय भागीदारी का महत्वपूर्ण उदाहरण बना। वर्ष 1933 में महात्मा गांधी के छिंदवाड़ा आगमन के दौरान उन्होंने जंगल सत्याग्रह में भाग लेने वाले आदिवासी कार्यकर्ताओं से मुलाकात कर उनके साहस की सराहना की।

लाखनवाड़ी की यह ऐतिहासिक गाथा उन ज्ञात और अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष की याद दिलाती है, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपने साहस और त्याग से स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूती दी। इसी संघर्ष की चेतना ने आगे चलकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी क्षेत्र की भागीदारी का आधार तैयार किया। लाखनवाड़ी की मिट्टी आज भी उन वीर सत्याग्रहियों के संघर्ष और बलिदान की स्मृति को संजोए हुए है।