1 जुलाई 1949 को जन्मे देवी सिंह बघेल पेशे से शिक्षक थे। धार्मिक प्रवृत्ति और सामाजिक सरोकारों के कारण उन्होंने अमरवाड़ा क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। बताया जाता है कि शिवधाम गरमेटा मंदिर, शारदा मठ, बर्दिया हनुमान मंदिर और साईं मंदिर सहित कई छोटे-बड़े धार्मिक स्थलों के निर्माण और विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। शिक्षा के क्षेत्र में सेवाएं देने के साथ ही वे धार्मिक स्थलों से जुड़े कार्यों में सक्रिय रहते थे। उनके प्रयासों से कई स्थानों को आस्था और धार्मिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में विकसित करने में मदद मिली।
शिक्षक के रूप में भी देवी सिंह बघेल की अपनी विशेष पहचान थी। बताया जाता है कि वे स्कूल में अनुशासन और पढ़ाई को लेकर काफी गंभीर रहते थे। अंग्रेजी विषय पर उनकी मजबूत पकड़ थी और कक्षा में पढ़ाते समय विद्यार्थी उनकी बातों को एकाग्रता से सुनते थे। ब्लैकबोर्ड पर कर्सिव राइटिंग में अंग्रेजी लिखने की उनकी शैली भी विद्यार्थियों के बीच चर्चा का विषय रहती थी। अंग्रेजी के अलावा हिंदी और संस्कृत पर भी उनकी अच्छी पकड़ बताई जाती है। उनके लिए शिक्षण केवल नौकरी नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण से जुड़ा कार्य था।
शिक्षण कार्य से समय निकालने के बाद वे धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहते थे। धार्मिक स्थलों के विकास के प्रति उनका समर्पण ऐसा था कि अमरवाड़ा और आसपास के क्षेत्रों में कई स्थानों को आस्था के केंद्र के रूप में विकसित करने में उन्होंने योगदान दिया। उनके परिचितों के अनुसार उनका जीवन सरल था और धार्मिक सोच उनके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। उनके स्वभाव और रोजमर्रा की आदतों को याद करते हुए परिचित बताते हैं कि उन्हें पान खाने का भी विशेष शौक था।
7 अक्टूबर 2011 को हार्ट अटैक के चलते देवी सिंह बघेल का निधन हो गया। उनके निधन को वर्षों बीत चुके हैं, लेकिन अमरवाड़ा क्षेत्र में उनके योगदान से जुड़े धार्मिक स्थल आज भी उनकी स्मृतियों को जीवित रखे हुए हैं। जिन स्थानों के निर्माण और विकास में उन्होंने अपनी भूमिका निभाई, वे आज भी लोगों की आस्था के केंद्र बने हुए हैं। यही कारण है कि क्षेत्र के लोग उन्हें केवल एक शिक्षक के रूप में नहीं, बल्कि धार्मिक और सामाजिक कार्यों में योगदान देने वाले व्यक्ति के रूप में भी याद करते हैं।
समय के साथ अमरवाड़ा का स्वरूप बदल रहा है और नई पीढ़ियां आगे बढ़ रही हैं, लेकिन क्षेत्र के धार्मिक स्थलों से जुड़ी स्मृतियां पुरानी पीढ़ी के योगदान को सामने लाती रहेंगी। देवी सिंह बघेल के परिवार में पत्नी शीतला बघेल वर्तमान में घर पर रहती हैं, जबकि उनकी पुत्री किरण बघेल अतिथि शिक्षक के पद पर सेवाएं दे रही हैं। शिक्षक दिवस विशेष के अवसर पर बघेल सर की स्मृति यह संदेश देती है कि शिक्षा के साथ समाज और संस्कृति के लिए किया गया योगदान भी व्यक्ति की पहचान को लंबे समय तक जीवित रख सकता है।