SC/ST एक्ट की धाराओं को चुनौती वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, 2020 के फैसले की समीक्षा से किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने बिना प्रारंभिक जांच FIR और गिरफ्तारी तथा अग्रिम जमानत से जुड़े प्रावधानों पर सवाल उठाए थे। कोर्ट ने कहा कि 2020 में इन प्रावधानों से जुड़े बदलावों को लेकर फैसला दिया जा चुका है और करीब छह साल बाद उस निर्णय की समीक्षा के लिए पर्याप्त आधार नजर नहीं आता।
UNITED NEWS OF ASIA. नई दिल्ली। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के खिलाफ अत्याचार रोकने के लिए बनाए गए SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने विचार करने से इनकार कर दिया। याचिका में अधिनियम की कई धाराओं को समानता और अन्य संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में चुनौती देते हुए उनमें बदलाव की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपियों के लिए कानून में पर्याप्त वैधानिक उपाय पहले से मौजूद हैं।
बृजभूषण सैनी और अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने दलील रखी कि अधिनियम की कुछ धाराओं के कारण बिना प्रारंभिक जांच FIR दर्ज करने और गिरफ्तारी की व्यवस्था पर सवाल उठते हैं। याचिका में धारा 3 की विभिन्न उपधाराओं के साथ धारा 4, 8, 18, 18-A और 19 को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि कानून का उद्देश्य एक वर्ग को अत्याचार से सुरक्षा देना है, लेकिन इसके प्रावधानों के दुरुपयोग की आशंका को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि SC/ST एक्ट के तहत कुछ मामलों में प्रारंभिक जांच के बिना FIR दर्ज होने और गिरफ्तारी की व्यवस्था आरोपी के अधिकारों को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत से संबंधित प्रतिबंधों पर भी सवाल उठाया गया। याचिकाकर्ता पक्ष ने कानून के कथित दुरुपयोग और मामलों में कम सजा दर का भी उल्लेख किया।
चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए 2020 में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का संदर्भ दिया। अदालत के अनुसार, इस विषय से जुड़े प्रावधानों और उनके संचालन पर पहले ही न्यायिक विचार हो चुका है। ऐसे में करीब छह साल बाद उस फैसले की दोबारा समीक्षा करने के लिए फिलहाल पर्याप्त आधार दिखाई नहीं देता।
SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम का उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के खिलाफ अत्याचार से जुड़े अपराधों को रोकना और पीड़ितों को कानूनी संरक्षण देना है। वहीं, इस कानून के कुछ प्रावधानों को लेकर समय-समय पर आरोपियों के अधिकार, गिरफ्तारी की प्रक्रिया और अग्रिम जमानत जैसे मुद्दे अदालतों के सामने उठते रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई में मुख्य मुद्दा अधिनियम के प्रावधानों की व्यापक संवैधानिक समीक्षा की मांग से जुड़ा था। अदालत ने मौजूदा मामले में 2020 के निर्णय के बाद फिर से उसी विषय को खोलने की आवश्यकता नहीं मानी। इससे याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए उन तर्कों पर इस स्तर पर कानून में कोई नया बदलाव नहीं हुआ है।
अदालत की टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब SC/ST एक्ट के तहत FIR, गिरफ्तारी और जमानत से जुड़े प्रावधानों को लेकर कानूनी बहस जारी है। सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा याचिका को स्वीकार कर अधिनियम की संबंधित धाराओं की नए सिरे से संवैधानिक समीक्षा शुरू करने के बजाय पहले के न्यायिक निर्णय को आधार माना।