OBC Reservation: क्रीमी लेयर पर केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट से झटका, UPSC 2025-26 के लिए मांगी थी छूट, अर्जी खारिज
ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर तय करने के नियमों को लेकर केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने केंद्र की उस अर्जी को खारिज कर दिया है, जिसमें फैसले को लागू करने के लिए UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 और 2026 में छूट मांगी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्रीमी लेयर निर्धारित करने में केवल माता-पिता की आय नहीं, बल्कि उनके पद और सामाजिक स्थिति को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
UNITED NEWS OF ASIA. अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण में क्रीमी लेयर निर्धारित करने के नियमों को लेकर केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार की उस अर्जी को खारिज कर दिया है, जिसमें क्रीमी लेयर से जुड़े फैसले को लागू करने के लिए अतिरिक्त समय और UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 और 2026 में छूट देने की मांग की गई थी। इस फैसले के बाद ओबीसी आरक्षण के तहत क्रीमी लेयर तय करने के मानदंडों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
केंद्र सरकार ने क्यों मांगी थी छूट?
केंद्र सरकार ने अगस्त महीने में सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर पहले दिए गए फैसले पर स्पष्टीकरण मांगा था। सरकार का तर्क था कि फैसले को अचानक लागू करने से प्रशासनिक स्तर पर कई तरह की जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।
केंद्र ने विशेष रूप से UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 और 2026 की चयन प्रक्रिया का हवाला दिया था। सरकार के मुताबिक, कैडर और सेवाओं का आवंटन, अधिकारियों का प्रशिक्षण और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं। इसी आधार पर सरकार ने दोनों परीक्षाओं के लिए राहत देने का अनुरोध किया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया।
क्रीमी लेयर तय करने में केवल आय नहीं होगी आधार
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि ओबीसी वर्ग में क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल माता-पिता की आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए माता-पिता का सरकारी या गैर-सरकारी पद, सामाजिक स्थिति और सेवा से जुड़े अन्य पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा।
अदालत ने कहा था कि अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों के लिए समानता के सिद्धांत के अनुरूप नियम लागू होने चाहिए।
2004 के सरकारी आदेश पर उठे थे सवाल
मामले में केंद्र सरकार के 2004 के आदेश को भी महत्वपूर्ण माना गया है। इस आदेश के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU), बैंकों और निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों के लिए वेतन से होने वाली आय को क्रीमी लेयर निर्धारण में आधार बनाया गया था।
वहीं सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के मामले में उनके माता-पिता के पद और सेवा की स्थिति को महत्व दिया जाता था। सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था में भेदभाव की संभावना पर सवाल उठाते हुए इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में दिए गए समानता के अधिकार के अनुरूप नहीं माना था।
3.70 लाख ओबीसी नियुक्तियों पर भी चर्चा
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 2016 के बाद केंद्र सरकार, रेलवे, बैंक, अर्धसैनिक बलों और विश्वविद्यालयों में करीब 3 लाख 70 हजार ओबीसी नियुक्तियां हुई हैं।
केंद्र सरकार ने आशंका जताई थी कि यदि फैसले को पिछली तारीख से लागू किया गया तो पहले हो चुकी नियुक्तियों को लेकर विवाद और मुकदमे बढ़ सकते हैं। इससे प्रशासनिक व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है।
UPSC अभ्यर्थियों पर क्या होगा असर?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र की अर्जी खारिज किए जाने के बाद क्रीमी लेयर निर्धारण से जुड़े नियमों के अनुपालन का मुद्दा महत्वपूर्ण हो गया है। खासकर UPSC सिविल सेवा परीक्षा के अभ्यर्थियों के लिए यह विषय अहम है, क्योंकि ओबीसी नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाणपत्र आरक्षण का लाभ लेने के लिए जरूरी होता है।
इस मामले में आगे सरकार की ओर से नियमों के क्रियान्वयन और प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया पर उठाए जाने वाले कदम महत्वपूर्ण होंगे। कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ओबीसी आरक्षण में समानता और क्रीमी लेयर निर्धारण के मानदंडों को लेकर अहम माना जा रहा है।