DPDP एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र सरकार को नोटिस; DNPA ने पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर जताई चिंता
डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट और इससे जुड़े नियमों को चुनौती देने वाली डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। DNPA का कहना है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से खोजी पत्रकारिता, स्वतंत्र रिपोर्टिंग और गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को निर्धारित है।
UNITED NEWS OF ASIA. नई दिल्ली। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट और इससे जुड़े नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस मामले में अदालत ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की ओर से दाखिल याचिका में कानून के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी गई है। एसोसिएशन का तर्क है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट का अभाव खोजी पत्रकारिता, स्वतंत्र रिपोर्टिंग और गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी।
DPDP एक्ट के प्रावधानों को चुनौती
DNPA ने 6 अक्टूबर को दाखिल याचिका में कानून के कई प्रावधानों को असंवैधानिक बताते हुए उन्हें रद्द करने और सुनवाई के दौरान अंतरिम रोक लगाने की मांग की है। एसोसिएशन में नेटवर्क18, NDTV और इंडियन एक्सप्रेस समेत 21 समाचार प्रकाशक शामिल हैं। केंद्र सरकार ने डिजिटल माध्यमों पर लोगों की निजी जानकारी की सुरक्षा के उद्देश्य से DPDP कानून बनाया है। हालांकि, DNPA का कहना है कि कानून के कुछ प्रावधान मीडिया संस्थानों के कामकाज और जनहित में खबरों के प्रकाशन के सामने व्यावहारिक चुनौतियां खड़ी कर सकते हैं।
खोजी पत्रकारिता और स्वतंत्र रिपोर्टिंग पर चिंता
DNPA की प्रमुख आपत्तियों में से एक यह है कि निजी जानकारी का इस्तेमाल करने से पहले सहमति लेने की अनिवार्यता खोजी पत्रकारिता को प्रभावित कर सकती है। एसोसिएशन के अनुसार, भ्रष्टाचार और अन्य अनियमितताओं की जांच के दौरान संबंधित व्यक्ति से पहले अनुमति लेने की जरूरत पड़ने पर महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना मुश्किल हो सकता है। ऐसी स्थिति में संबंधित व्यक्ति को जांच की जानकारी पहले मिलने और सबूत नष्ट होने की आशंका भी जताई गई है।
प्रकाशित खबरें हटाने के दबाव की आशंका
एसोसिएशन ने यह चिंता भी जताई है कि निजी डेटा मिटाने या सहमति वापस लेने की मांग के जरिए पहले से प्रकाशित खबरों को हटाने अथवा उनमें बदलाव कराने का दबाव बनाया जा सकता है। DNPA के मुताबिक, जनहित में प्रकाशित रिपोर्टों के संदर्भ में ऐसे प्रावधानों का प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि, ये याचिकाकर्ता की ओर से उठाई गई आशंकाएं हैं, जिन पर अदालत में विचार होना बाकी है।
गोपनीय सूत्रों और RTI कानून का मुद्दा
DNPA ने सरकारी संस्थाओं को मिली कुछ शक्तियों को लेकर भी सवाल उठाए हैं। एसोसिएशन का कहना है कि सूचना मांगने की शक्तियों के कारण पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर होने का खतरा पैदा हो सकता है। इसके अलावा, याचिका में सूचना का अधिकार (RTI) कानून की धारा 8(1)(j) में किए गए संशोधन को भी चुनौती दी गई है। DNPA के अनुसार, इससे सार्वजनिक हित से जुड़ी जानकारी तक नागरिकों की पहुंच प्रभावित हो सकती है।
सरकारी शक्तियों की सीमाएं तय करने की मांग
एसोसिएशन ने सरकारी संस्थाओं को दी गई छूट और सूचना तक पहुंच सीमित करने की शक्तियों पर स्पष्ट कानूनी सीमाएं तय करने की मांग की है। उसका कहना है कि डिजिटल निजता की सुरक्षा के साथ पत्रकारिता की स्वतंत्रता और जनहित में सूचना प्रकाशित करने के अधिकारों के बीच संतुलन जरूरी है।
अब इस मामले में केंद्र सरकार के जवाब और 17 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई पर नजर रहेगी। सुप्रीम कोर्ट का आगे का रुख यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि डिजिटल डेटा सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों और पत्रकारिता की स्वतंत्रता के बीच उठाए गए सवालों पर किस तरह विचार किया जाएगा।