लिव-इन रिलेशनशिप टूटने पर सहमति से बने संबंध रेप नहीं, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप और सहमति से बने शारीरिक संबंधों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि दो बालिगों के बीच आपसी सहमति से बने संबंध केवल रिश्ता टूटने के आधार पर रेप नहीं माने जा सकते। हालांकि, शुरुआत से ही शादी का झूठा वादा करके सहमति हासिल करने का मामला अलग हो सकता है। कोर्ट ने संबंधित मामले में आरोपी को आरोपों से मुक्त कर दिया।

Oct 30, 2026 - 15:34
 0  2
लिव-इन रिलेशनशिप टूटने पर सहमति से बने संबंध रेप नहीं, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

UNITED NEWS OF ASIA. नई दिल्ली। लिव-इन रिलेशनशिप और सहमति से बने शारीरिक संबंधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दो बालिग व्यक्तियों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध केवल इस वजह से रेप नहीं माने जा सकते कि बाद में उनका रिश्ता टूट गया। हालांकि, यदि शुरुआत से ही शादी करने का इरादा नहीं था और झूठा वादा करके शारीरिक संबंध बनाए गए, तो मामला अलग हो सकता है। यह टिप्पणी शादी का झूठा वादा करके रेप के आरोप से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की गई।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने मामले की परिस्थितियों पर विचार करते हुए कहा कि किसी रिश्ते का बाद में खत्म हो जाना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि शुरुआत में शादी का वादा धोखे से किया गया था। अदालत ने संबंधित मामले में आरोपी को आरोपों से मुक्त कर दिया।

रिश्ता टूटने मात्र से रेप का मामला नहीं बनता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाल के वर्षों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें आपसी सहमति से बने रिश्ते के समाप्त होने के बाद आपराधिक कानून का सहारा लिया जाता है। अदालत के मुताबिक, दो वयस्कों के बीच सहमति से बने संबंधों और शुरुआत से धोखे की मंशा के साथ बनाए गए संबंधों के बीच अंतर समझना जरूरी है। किसी रिश्ते के भविष्य में सफल नहीं होने या शादी तक नहीं पहुंचने को सीधे तौर पर आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता।

शादी के झूठे वादे पर क्या है कानूनी स्थिति?

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले में यह साबित होता है कि आरोपी ने शुरुआत से ही शादी करने का इरादा नहीं रखा था और केवल शारीरिक संबंध बनाने के उद्देश्य से झूठा वादा किया था, तो कानूनी स्थिति अलग होगी। ऐसे मामलों में सहमति किन परिस्थितियों में प्राप्त की गई, इसकी जांच जरूरी है। इसलिए हर मामले का फैसला उसके तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर भी अदालत की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान अदालत ने रिश्ते को समाप्त करने के व्यक्ति के अधिकार पर भी सवाल उठाया। पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति को अपनी इच्छा से रिश्ता खत्म करने का अधिकार है। केवल अलग होने के फैसले को धोखाधड़ी या रेप का आधार नहीं बनाया जा सकता। किसी व्यक्ति को रिश्ते में बने रहने के लिए मजबूर करना उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है।

यौन अपराधों की शिकायतों को गंभीरता से लेना जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि रेप एक गंभीर अपराध है और यौन हिंसा, दबाव या धोखे से सहमति हासिल करने के मामलों में कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। सामाजिक बदनामी और अन्य कारणों से कई पीड़ित महिलाएं शिकायत दर्ज कराने से पीछे रह जाती हैं। ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और निष्पक्ष जांच जरूरी है।

अदालत की टिप्पणी का सार यह है कि सहमति से बने रिश्ते का टूटना अपने आप में रेप का प्रमाण नहीं है। वहीं, शुरुआत से शादी का झूठा वादा करके सहमति हासिल करने के आरोपों की जांच तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर की जानी चाहिए।