रायगढ़ के छर्राटांगर में प्राकृतिक खेती पर कार्यशाला, किसानों ने सीखी हर्बल अर्क बनाने और कीट नियंत्रण की तकनीक
रायगढ़ जिले के ग्राम छर्राटांगर में प्राकृतिक कृषि जागरूकता एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित की गई। लोक में राम शोध संस्थान की रायगढ़ इकाई के तत्वावधान और सांसद राधेश्याम राठिया के मुख्य संयोजन में आयोजित इस कार्यक्रम में किसानों को बिना रासायनिक कीटनाशकों के हर्बल अर्क तैयार करने और प्राकृतिक तरीके से फसल सुरक्षा की तकनीक सिखाई गई। विशेषज्ञ नागेंद्र दुबे ने स्थानीय वनस्पतियों, गोमूत्र और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से खेती की लागत कम करने के तरीके बताए।
UNITED NEWS OF ASIA. महेंद्र अग्रवाल, रायगढ़ l छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के ग्राम छर्राटांगर में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्राकृतिक कृषि जागरूकता एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। एक नवंबर 2026 को आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में किसानों ने हिस्सा लिया। कार्यशाला का उद्देश्य किसानों को रासायनिक खादों और जहरीले कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने के साथ खेती की लागत घटाने और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के प्राकृतिक उपायों से परिचित कराना था।
यह आयोजन लोक में राम शोध संस्थान की रायगढ़ इकाई के तत्वावधान में तथा सांसद राधेश्याम राठिया के मुख्य संयोजन में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में ग्राम पंचायत छर्राटांगर की सरपंच सुखमती श्रीकांत राठिया का विशेष सहयोग और उपस्थिति रही। कार्यशाला में रायपुर से आमंत्रित वरिष्ठ प्राकृतिक कृषि विशेषज्ञ एवं सलाहकार नागेंद्र दुबे मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए।
किसानों को संबोधित करते हुए नागेंद्र दुबे ने कहा कि रासायनिक खादों और कीटनाशकों के लगातार उपयोग से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति प्रभावित हो रही है। इसके साथ ही खेती की लागत भी बढ़ती जा रही है, जिससे किसानों के सामने आर्थिक चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। उन्होंने प्राकृतिक खेती को इन समस्याओं के स्थायी समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण विकल्प बताया। उनके अनुसार पारंपरिक कृषि ज्ञान और वैज्ञानिक तरीकों को मिलाकर खेती की ऐसी पद्धति विकसित की जा सकती है, जिसमें स्थानीय संसाधनों का अधिकतम उपयोग हो।
कार्यशाला की खास बात इसका व्यावहारिक प्रशिक्षण रहा। विशेषज्ञ ने किसानों को खेत और आसपास उपलब्ध स्थानीय वनस्पतियों, गोमूत्र तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों की मदद से हर्बल अर्क तैयार करने की विधि समझाई। इस अर्क का उपयोग प्राकृतिक कीट नियंत्रण के लिए किया जा सकता है। किसानों को बताया गया कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री से ऐसे प्राकृतिक घोल तैयार करने से बाजार में मिलने वाले महंगे कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
प्रशिक्षण के दौरान यह भी बताया गया कि प्राकृतिक खेती में मित्र कीटों, मिट्टी की सेहत और जैव विविधता का संरक्षण महत्वपूर्ण है। रासायनिक कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से खेती के पारिस्थितिक संतुलन पर असर पड़ सकता है। ऐसे में प्राकृतिक उपायों को अपनाकर फसल सुरक्षा के साथ खेत की मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने की दिशा में प्रयास किए जा सकते हैं।
कार्यक्रम के संचालन और संयोजन में लोक में राम शोध संस्थान की रायगढ़ इकाई के जिला प्रमुख आलोक बेहरा और जिला सह प्रमुख पवन प्रधान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संस्था के प्रतिनिधियों ने कहा कि किसान केवल अन्नदाता ही नहीं, बल्कि धरती, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य के संरक्षक भी हैं। उनके अनुसार प्राकृतिक खेती को गांव-गांव तक पहुंचाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिल सकती है।
संस्था ने रायगढ़ अंचल के अधिक से अधिक गांवों और किसानों तक इस तरह का व्यावहारिक प्रशिक्षण पहुंचाने का संकल्प दोहराया। कार्यशाला में शामिल किसानों ने भी अपनी खेती में प्राकृतिक तकनीकों को अपनाने और विषमुक्त कृषि उत्पादन की दिशा में प्रयास करने की सहमति जताई। आयोजकों के अनुसार आने वाले समय में प्राकृतिक खेती से जुड़े जागरूकता और प्रशिक्षण कार्यक्रम लगातार जारी रखे जाएंगे।