ऑस्ट्रेलियाई सरकार के अनुसार, उसकी उम्मीदवारी का आधार अंतरराष्ट्रीय कानून, बहुपक्षवाद, संप्रभुता, सतत विकास, मानवाधिकार, समावेशन और पारदर्शिता जैसे सिद्धांत हैं। सरकार ने कहा है कि वह ऐसी दुनिया के लिए काम करना चाहती है जहां विवादों का समाधान नियमों और संवाद के जरिए हो तथा कोई देश दूसरे पर केवल शक्ति के आधार पर हावी न हो।
प्रधानमंत्री एंथोनी अल्बानीज़ ने अभियान के संदेश में कहा कि सुरक्षित दुनिया नियमों से संचालित होनी चाहिए, केवल शक्ति और बल से नहीं। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए देशों का मिलकर काम करना जरूरी है और इसी उद्देश्य से ऑस्ट्रेलिया 2029 से 2030 के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सीट हासिल करने की कोशिश कर रहा है।
ऑस्ट्रेलिया ने अपनी प्राथमिकताओं में संघर्षों की रोकथाम, नागरिकों की सुरक्षा, कूटनीति और सहयोग को बढ़ावा देना, अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन, समुद्री और जलवायु सुरक्षा तथा सुरक्षित एवं समावेशी डिजिटल भविष्य को शामिल किया है। ऑस्ट्रेलियाई विदेश मंत्रालय के अनुसार, देश सुरक्षा परिषद में छोटे और मध्यम आकार के देशों की आवाज को मजबूत करने तथा संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रभावी और प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने पर भी जोर देगा।
ऑस्ट्रेलिया का कहना है कि वह सुरक्षा परिषद में शामिल होने की स्थिति में अलग-अलग क्षेत्रों और देशों के साथ समान साझेदारी के आधार पर काम करेगा। उसकी प्रस्तावित कार्यशैली में विभिन्न पक्षों की बात सुनना, देशों के बीच सहयोग बढ़ाना और संघर्ष के जोखिम को कम करने के लिए शुरुआती कूटनीतिक प्रयासों को मजबूत करना शामिल है।
ऑस्ट्रेलिया का संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पहले भी प्रतिनिधित्व रहा है। वह 1946-47, 1956-57, 1973-74, 1985-86 और 2013-14 में गैर-स्थायी सदस्य रह चुका है। ऑस्ट्रेलियाई सरकार के अनुसार, 2029-30 में चुने जाने पर यह सुरक्षा परिषद में उसका छठा कार्यकाल होगा।
2029-30 के लिए ऑस्ट्रेलिया पश्चिमी यूरोपीय और अन्य राज्यों के समूह की सीट के लिए उम्मीदवार है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 10 गैर-स्थायी सदस्य होते हैं, जिनका चुनाव महासभा द्वारा क्षेत्रीय समूहों के आधार पर किया जाता है। ऑस्ट्रेलिया के साथ फिनलैंड भी इसी समूह से 2029-30 की सीट के लिए उम्मीदवार है।
ऑस्ट्रेलिया ने अपने अभियान में कहा है कि वह शांति, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय नियमों को मजबूत करने के लिए साझेदार देशों के साथ मिलकर काम करना चाहता है। अब 2029-30 के कार्यकाल के लिए होने वाले चुनाव में सदस्य देशों के समर्थन के आधार पर उसकी दावेदारी तय होगी।