सूरत की अनोखी परंपरा: शरद पूर्णिमा के अगले दिन क्यों खाते हैं खास मिठाई घारी?

गुजरात के सूरत में शरद पूर्णिमा के अगले दिन चांदी पड़वा मनाने की खास परंपरा है। इस अवसर पर लोग पारंपरिक मिठाई घारी और विभिन्न प्रकार के नमकीन यानी भुसु का आनंद लेते हैं। मावा, घी, चीनी और मेवों से तैयार होने वाली घारी सूरत की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। त्योहार के दौरान इसकी मांग बढ़ जाती है और लोग इसे परिवार, रिश्तेदारों तथा दोस्तों के साथ साझा करते हैं।

Oct 26, 2026 - 11:29
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सूरत की अनोखी परंपरा: शरद पूर्णिमा के अगले दिन क्यों खाते हैं खास मिठाई घारी?

UNITED NEWS OF ASIA. गुजरात के सूरत शहर में त्योहारों के साथ खान-पान की एक अनोखी परंपरा जुड़ी हुई है। शरद पूर्णिमा के अगले दिन यहां चांदी पड़वा मनाया जाता है। इस अवसर पर शहर के लोग खास मिठाई घारी खाते हैं। हीरे और कपड़ा उद्योग के लिए प्रसिद्ध सूरत की पहचान में घारी ने भी अपनी अलग जगह बनाई है। यह मिठाई केवल स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि शहर की सांस्कृतिक परंपरा और पारिवारिक मेल-मिलाप का भी हिस्सा है।

चांदी पड़वा पर घारी की धूम

चांदी पड़वा आते ही सूरत की मिठाई की दुकानों पर घारी की मांग बढ़ जाती है। लोग इसे अपने परिवार के लिए खरीदते हैं और रिश्तेदारों तथा दोस्तों को भी भेंट करते हैं। जैसे इंदौर का पोहा और मुंबई का वड़ा पाव अपनी खास पहचान रखते हैं, उसी तरह घारी को सूरत की पारंपरिक मिठाई के रूप में जाना जाता है। त्योहार के दौरान बाजारों में इसकी कई किस्में देखने को मिलती हैं।

क्या है सुरती घारी और कैसे बनती है?

घारी अपने खास स्वाद, समृद्ध सामग्री और अलग बनावट के लिए प्रसिद्ध है। इसे आमतौर पर मैदे की बाहरी परत में मावा, घी, चीनी और मेवों का मिश्रण भरकर तैयार किया जाता है। इसके बाद इसे घी में तलकर बनाया जाता है। समय के साथ इस पारंपरिक मिठाई में कई नए प्रयोग भी हुए हैं। आज बाजार में चॉकलेट, स्ट्रॉबेरी, केसर, पिस्ता और बादाम जैसे फ्लेवर की घारी उपलब्ध है। कुछ दुकानों पर इसकी लगभग 20 किस्में भी मिलती हैं। खास सजावट वाली घारी भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहती है।

चांदी पड़वा पर क्यों खाते हैं घारी?

चांदी पड़वा गुजरात, विशेषकर सूरत की विशिष्ट सांस्कृतिक परंपरा है। यह आश्विन मास की शरद पूर्णिमा के अगले दिन मनाया जाता है। शरद पूर्णिमा का हिंदू धार्मिक परंपराओं में विशेष महत्व है और इसे चंद्रमा की पूर्ण कलाओं तथा चांदनी रात से जोड़ा जाता है। सूरत में इस अवसर पर घारी के साथ भुसु यानी विभिन्न प्रकार के नमकीन खाने का भी चलन है। परिवार और दोस्त एक साथ बैठकर इन व्यंजनों का आनंद लेते हैं।

तात्या टोपे से जुड़ी है एक लोकमान्यता

घारी की शुरुआत को लेकर अलग-अलग कहानियां प्रचलित हैं। एक लोकप्रिय लोकमान्यता इसे 1857 के स्वतंत्रता संग्राम और तात्या टोपे से जोड़ती है। कहा जाता है कि संघर्ष के दौरान सैनिकों को ऊर्जा देने के लिए घारी जैसी पौष्टिक मिठाई दी जाती थी। हालांकि, इस कहानी की ऐतिहासिक पुष्टि सीमित है और घारी के आविष्कार की सटीक तारीख को लेकर भी अलग-अलग विवरण मिलते हैं।

सूरत की सांस्कृतिक पहचान बनी घारी

घारी दूसरे शहरों में भी उपलब्ध है, लेकिन चांदी पड़वा के अवसर पर इसे खाने की परंपरा सूरत को इससे खास तौर पर जोड़ती है। त्योहार के दिनों में मिठाई की दुकानों पर इसकी मांग बढ़ती है। सूरत से बाहर रहने वाले लोग भी इसे अपने परिवार और परिचितों के लिए मंगवाते हैं। इस तरह घारी स्वाद के साथ शहर की परंपरा, अपनापन और सांस्कृतिक विरासत को भी आगे बढ़ाती है।