सुप्रीम कोर्ट की कॉर्पोरेट मंत्रालय पर तीखी टिप्पणी, कहा- NCLT और NCLAT को मंत्रालय ने ‘हाईजैक’ किया
सुप्रीम कोर्ट ने NCLT और NCLAT में संविदा कर्मचारियों की नियुक्ति और सेवा संबंधी याचिका पर सुनवाई के दौरान कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय की भूमिका पर गंभीर टिप्पणी की। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि मंत्रालय का ट्रिब्यूनल पर अत्यधिक नियंत्रण संस्थागत स्वायत्तता में हस्तक्षेप है। अदालत ने ट्रिब्यूनल के अध्यक्षों को नियुक्तियों में स्वतंत्रता देने, अंतरिम व्यवस्था के तौर पर प्रतिनियुक्ति और UPSC या SSC के माध्यम से नियमित भर्ती का सुझाव दिया। सुनवाई में छह साल से काम कर रहे संविदा कर्मचारियों के अधिकारों और संभावित नौकरी समाप्ति का मुद्दा भी उठा।
UNITED NEWS OF ASIA. नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) और नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) में संविदा कर्मचारियों की नियुक्ति और सेवा से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय की भूमिका पर तीखी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि मंत्रालय ने इन महत्वपूर्ण ट्रिब्यूनलों को पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लिया है। सुनवाई के दौरान इसे संस्थागत स्वायत्तता में हस्तक्षेप बताते हुए पीठ ने ट्रिब्यूनल के अध्यक्षों को नियुक्तियों के मामले में अधिक स्वतंत्रता देने की जरूरत पर जोर दिया।
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ कर रही थी। पीठ ने कहा कि NCLT और NCLAT के अध्यक्षों के पास कर्मचारियों की नियुक्ति करने की पर्याप्त स्वायत्तता होनी चाहिए। अदालत ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर प्रतिनियुक्ति का सुझाव दिया। साथ ही नियमित भर्तियां UPSC या SSC के माध्यम से चरणबद्ध तरीके से कराने की बात कही।
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय ट्रिब्यूनल पर पूरी तरह नियंत्रण रखना चाहता है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने संविदा कर्मचारियों की नियुक्ति में ठेकेदारों की भूमिका और उनके कामकाज पर भी चिंता जताई। पीठ के अनुसार, न्यायिक और तकनीकी सदस्यों के कामकाज को ध्यान में रखते हुए संस्थाओं को अपने प्रशासनिक फैसले लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
छह साल से काम कर रहे कर्मचारियों का मामला
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने अदालत को बताया कि कई संविदा कर्मचारी पिछले छह वर्षों से NCLT और NCLAT में काम कर रहे हैं। उन्होंने दलील दी कि संविदा पर नियुक्त होने का अर्थ यह नहीं है कि कर्मचारियों के कोई अधिकार नहीं हैं। यदि भर्ती नियमों और विज्ञापन में नियमितीकरण से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं, तो कर्मचारियों को अचानक सेवा से बाहर करना उचित नहीं होगा।
अधिवक्ता ने आशंका जताई कि 1 या 2 नवंबर से मौजूदा कर्मचारियों को काम छोड़ना पड़ सकता है और उनकी जगह किसी निजी कंपनी के माध्यम से नियुक्तियां की जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि बिना उचित प्रक्रिया और संबंधित अध्यक्ष की मंजूरी के कर्मचारियों को हटाना मनमाना कदम होगा। याचिका में इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के अधिकार के उल्लंघन से भी जोड़ा गया।
नियमित भर्ती और कर्मचारियों के अधिकारों पर जोर
सुनवाई के दौरान अदालत ने संविदा कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाओं का मुद्दा भी उठाया। बताया गया कि संविदा पर नियुक्त होने के कारण उन्हें HRA और DA जैसी सुविधाएं नहीं मिलती हैं। पीठ ने भर्ती व्यवस्था में पारदर्शिता और संस्थागत स्वतंत्रता की आवश्यकता पर जोर दिया।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से स्पष्ट है कि इस मामले में केवल संविदा कर्मचारियों की नौकरी का सवाल नहीं है, बल्कि NCLT और NCLAT की प्रशासनिक स्वायत्तता तथा नियमित भर्ती व्यवस्था भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। अब इस मामले में अदालत के आगे के निर्देशों पर कर्मचारियों और संबंधित संस्थाओं की नजर रहेगी।