रायपुर में गीता ज्ञान अमृत वर्षा का समापन, गुरुदेव संकर्षण शरण जी ने बताया सात्त्विक जीवन और भक्ति का महत्व

रायपुर में मां कामाख्या धर्मादा ट्रस्ट भारत वर्ष के संयोजन में आयोजित त्रिदिवसीय ‘गीता ज्ञान अमृत वर्षा’ में गुरुदेव संकर्षण शरण जी ने गीता के माध्यम से भक्ति, कर्म, तीनों गुणों के संतुलन और सात्त्विक जीवनशैली का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि रजोगुण से प्रभावित व्यक्ति द्वंद्व में उलझा रहता है और स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। कथा के समापन अवसर पर 30 अक्टूबर को सुबह 7 बजे भव्य हवन आयोजित किया जाएगा।

Oct 30, 2026 - 07:53
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रायपुर में गीता ज्ञान अमृत वर्षा का समापन, गुरुदेव संकर्षण शरण जी ने बताया सात्त्विक जीवन और भक्ति का महत्व

UNITED NEWS OF ASIA. अमृतेश्वर सिंह, रायपुर l मां कामाख्या धर्मादा ट्रस्ट भारत वर्ष के संयोजन में आयोजित त्रिदिवसीय ‘गीता ज्ञान अमृत वर्षा’ में गुरुदेव संकर्षण शरण जी ने श्रद्धालुओं को गीता के विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से जीवन में भक्ति, कर्म, संयम और संतुलन का महत्व समझाया। कथा के दौरान उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा कि ईश्वर हमारे समीप हैं और सच्ची भक्ति के माध्यम से उनकी अनुभूति की जा सकती है।

गुरुदेव ने भगवान राम के शस्त्र उठाने और अधर्मियों के शस्त्र उठाने के उद्देश्य में अंतर बताते हुए कहा कि भगवान राम तभी शस्त्र उठाते हैं, जब धर्म की हानि होने लगती है। उनके अनुसार, अधर्मी अन्याय और अधर्म के लिए शस्त्र उठाते हैं, जबकि भगवान राम न्याय और शुभ कार्यों की रक्षा के लिए शस्त्र उठाते हैं। उन्होंने कहा कि धर्म और मर्यादा का पालन जीवन में अत्यंत आवश्यक है।

भक्ति के विषय में गुरुदेव संकर्षण शरण जी ने कहा कि भक्ति मार्ग भी है और मंजिल भी। जब व्यक्ति ईश्वर की आराधना करते हुए सत्मार्ग पर आगे बढ़ता है, तब वह भक्ति के मार्ग पर होता है। वहीं, जब उसकी भक्ति सफल होती है और उसे ईश्वर की अनुभूति होती है, तब वही भक्ति उसकी मंजिल बन जाती है। उन्होंने अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप के दर्शन का उदाहरण देते हुए श्रद्धालुओं को भक्ति में प्रेम और समर्पण का महत्व समझाया।

गुरुदेव ने रजोगुण से प्रभावित व्यक्ति की प्रवृत्ति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐसा व्यक्ति हमेशा द्वंद्व में उलझा रहता है। उसे यह स्पष्ट नहीं होता कि जीवन में क्या करना है और क्या नहीं। वह अहंकार, पद-प्रतिष्ठा और नाम की सिद्धि में लगा रहता है। उन्होंने बताया कि जब व्यक्ति के तीनों प्राकृतिक गुण असंतुलित हो जाते हैं, तब वह उस गुण के प्रभाव में अधिक रहता है, जो उस पर हावी होता है। जीवन में संतुलन बनाए रखने के लिए तीनों गुणों का संतुलित होना जरूरी है।

उन्होंने श्रद्धालुओं को रुचि और नीति के बीच अंतर समझाते हुए कहा कि केवल अपनी पसंद के अनुसार चलने वाला व्यक्ति भटक सकता है, जबकि नीति को प्राथमिकता देने वाला व्यक्ति सत्मार्ग पर आगे बढ़ता है। गुरुदेव ने कहा कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। व्यक्ति का भोजन और उसकी जीवनशैली भी उसके स्वभाव तथा विचारों को प्रभावित करती है।

भोजन के संदर्भ में उन्होंने सात्त्विक, राजसिक और तामसिक प्रवृत्तियों की जानकारी दी। उनके अनुसार, अत्यधिक तीखा, खट्टा और मसालेदार भोजन राजसिक प्रवृत्ति को बढ़ाता है, जबकि बासी भोजन का अत्यधिक सेवन तमोगुण से जुड़ा है। उन्होंने ताजा, संतुलित और सरल भोजन को सात्त्विक जीवनशैली का आधार बताया। इसके साथ ही सात्त्विक, राजसिक और तामसिक दान के विषय में भी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि दान, यज्ञ और अन्य कार्य जब कर्तव्य भाव से किए जाते हैं, तो वे सात्त्विक होते हैं।

कथा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु देर शाम तक उपस्थित रहे। आरती-पूजन के बाद मां कामाख्या धर्मादा ट्रस्ट की ओर से निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर भी आयोजित किया गया, जिसमें वासुदेव मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल से पहुंचे डॉक्टरों ने लोगों को स्वास्थ्य परामर्श दिया।

मीडिया प्रभारी कल्पना शुक्ला ने बताया कि 29 अक्टूबर को त्रिदिवसीय कथा का अंतिम दिन रहा। कथा का विधिवत समापन 30 अक्टूबर को सुबह 7 बजे आयोजित भव्य हवन के साथ किया जाएगा।