हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सार्वजनिक हित के बिना RTI में नहीं मिलेगी किसी की व्यक्तिगत जानकारी

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सूचना के अधिकार (RTI) के तहत किसी व्यक्ति की निजी जानकारी तीसरे पक्ष को नहीं दी जा सकती, जब तक उससे कोई बड़ा सार्वजनिक हित जुड़ा न हो। कोर्ट ने इस आधार पर दो याचिकाएं खारिज कर दीं।

Aug 5, 2026 - 10:42
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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सार्वजनिक हित के बिना RTI में नहीं मिलेगी किसी की व्यक्तिगत जानकारी

UNITED NEWS OF ASIA. बिलासपुर। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम की सीमाओं और व्यक्तिगत निजता की सुरक्षा को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने कहा कि किसी भी व्यक्ति की निजी जानकारी, जैसे विवाह पंजीयन आवेदन, जन्मतिथि, पहचान पत्र या अन्य व्यक्तिगत दस्तावेज, केवल आरटीआई के आधार पर किसी तीसरे पक्ष को उपलब्ध नहीं कराए जा सकते, जब तक कि उससे कोई बड़ा सार्वजनिक हित जुड़ा न हो।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सूचना का अधिकार अधिनियम का उद्देश्य सरकारी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है, लेकिन इसके साथ ही अधिनियम की धारा 8(1)(जे) नागरिकों की व्यक्तिगत निजता की रक्षा भी करती है। इसलिए निजी सूचनाओं का खुलासा तभी संभव है, जब उससे व्यापक जनहित प्रभावित होता हो।

मामला अंबिकापुर निवासी डीके सोनी द्वारा दायर याचिकाओं से जुड़ा था। उन्होंने सूरजपुर जिले के विशेष विवाह अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत विवाह पंजीयन आवेदनों, उनसे संबंधित दस्तावेजों, आदेशों और प्रकाशित इश्तहारों की प्रमाणित प्रतियां सूचना के अधिकार के तहत मांगी थीं।

जन सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अधिकारी ने यह कहते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया कि आवेदक तीसरा पक्ष है और मांगी गई जानकारी न्यायिक प्रक्रिया से संबंधित होने के साथ व्यक्तिगत प्रकृति की है। इसके बाद मामला राज्य सूचना आयोग पहुंचा, जहां आयोग ने भी जन सूचना अधिकारी के निर्णय को सही ठहराते हुए द्वितीय अपील खारिज कर दी।

आयोग के फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि विवाह पंजीयन आवेदन में नाम, पता, जन्मतिथि, फोटो, पहचान पत्र और अन्य निजी जानकारियां शामिल होती हैं, जिनका खुलासा किसी व्यक्ति की निजता का उल्लंघन हो सकता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि आवेदक यह साबित नहीं कर पाता कि मांगी गई जानकारी भ्रष्टाचार उजागर करने, पद के दुरुपयोग को सामने लाने या किसी अन्य महत्वपूर्ण सार्वजनिक हित से जुड़ी है, तो ऐसी जानकारी उपलब्ध कराना उचित नहीं होगा। अदालत ने इसे व्यक्ति की निजता पर अनावश्यक हस्तक्षेप माना।

इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं को खारिज करते हुए राज्य सूचना आयोग के आदेश को बरकरार रखा। यह फैसला भविष्य में आरटीआई के तहत व्यक्तिगत जानकारी मांगने वाले मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि सूचना के अधिकार और निजता के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखना कानून की मूल भावना है।