दोबारा गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, मजिस्ट्रेट की मंजूरी जरूरी; पुलिस को बताना होगा कारण

सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के कारण किसी गिरफ्तारी को अवैध घोषित किए जाने के बाद दोबारा गिरफ्तारी की प्रक्रिया को लेकर अहम दिशा-निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में पुलिस को संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन देना होगा और दोबारा गिरफ्तारी की जरूरत के कारण बताने होंगे। आरोपी को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध कराना भी जरूरी होगा।

Sep 21, 2026 - 13:59
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दोबारा गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, मजिस्ट्रेट की मंजूरी जरूरी; पुलिस को बताना होगा कारण

UNITED NEWS OF ASIA. सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के कारण अवैध घोषित की गई गिरफ्तारी के बाद आरोपी को दोबारा गिरफ्तार करने की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए हैं। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि ऐसी स्थिति में दोबारा गिरफ्तारी का फैसला संबंधित पुलिस अधिकारी की इच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता। पुलिस को पहले संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन देना होगा और दोबारा गिरफ्तारी के लिए न्यायिक मंजूरी प्राप्त करनी होगी।

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, दोबारा गिरफ्तारी के लिए आवेदन तभी किया जा सकता है, जब आरोपी को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध करा दिए गए हों। इसके साथ ही आवेदन पर उस पुलिस अधिकारी से तत्काल वरिष्ठ अधिकारी की मंजूरी भी जरूरी होगी, जिसने पहली बार आरोपी को गिरफ्तार किया था। कोर्ट ने इस प्रक्रिया को इसलिए जरूरी माना है ताकि संविधान के अनुच्छेद 22(1) में दिए गए गिरफ्तारी से जुड़े मौलिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि पहली गिरफ्तारी के समय आरोपी को गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए थे और इसी वजह से गिरफ्तारी को अवैध घोषित किया गया, तो बाद में उन्हीं परिस्थितियों में सीधे दोबारा गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। पुलिस को मजिस्ट्रेट के सामने यह बताना होगा कि गिरफ्तारी के आधार शुरुआती स्तर पर क्यों उपलब्ध नहीं कराए जा सके और बाद में उन्हें आरोपी को किस तरह बताया गया।

मजिस्ट्रेट को पुलिस के आवेदन पर जल्द फैसला करने का निर्देश दिया गया है। अदालत के मुताबिक, यदि मजिस्ट्रेट इस बात से संतुष्ट होता है कि गिरफ्तारी के आधार शुरुआत में उचित कारणों से नहीं बताए जा सके थे, लेकिन बाद में आरोपी को वे आधार उपलब्ध करा दिए गए हैं और जांच के लिए दोबारा गिरफ्तारी आवश्यक है, तभी दोबारा गिरफ्तारी की अनुमति दी जा सकती है।

पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि ऐसी परिस्थितियों में जांच किसी दूसरे अधिकारी को सौंपने पर विचार किया जाना चाहिए। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि जब अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के कारण किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी अवैध हो जाती है, तो उसी अधिकारी के विवेक पर दोबारा गिरफ्तारी का अधिकार छोड़ना उचित नहीं होगा। अदालत के अनुसार, इस प्रक्रिया में न्यायिक निगरानी जरूरी है।

यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2025 के मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में तय किए गए सिद्धांतों से जुड़ा है। उस मामले में अदालत ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के आधार आरोपी को लिखित रूप में बताना संवैधानिक सुरक्षा का हिस्सा है और इसका पालन नहीं होने पर गिरफ्तारी तथा उसके आधार पर आगे की हिरासत की वैधता प्रभावित हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 22(1) किसी एक विशेष आपराधिक कानून तक सीमित नहीं है। गिरफ्तारी की प्रकृति और लागू कानून के अनुसार प्रक्रिया अलग हो सकती है, लेकिन गिरफ्तारी के आधार बताए जाने का संवैधानिक अधिकार व्यापक रूप से लागू होता है। अदालत के निर्देशों का उद्देश्य अवैध गिरफ्तारी के बाद होने वाली दोबारा गिरफ्तारी में न्यायिक निगरानी और प्रक्रियात्मक सुरक्षा सुनिश्चित करना है।