नए नियम के तहत 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) UPI लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू होगा। यह शुल्क व्यापारी से लिया जाएगा और प्रति लेनदेन अधिकतम 300 रुपये तक सीमित रहेगा। 75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन पर भी MDR की अधिकतम सीमा 300 रुपये होगी।
वहीं, 2,000 रुपये तक के P2M UPI लेनदेन पर MDR नहीं लगेगा। व्यक्ति से व्यक्ति यानी P2P ट्रांजैक्शन भी इस शुल्क के दायरे में नहीं आएंगे। सरकार के अनुसार उपभोक्ताओं से सीधे यह शुल्क नहीं लिया जाना है और बैंकों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि MDR का बोझ ग्राहकों पर न डाला जाए।
व्यापारी संगठनों का कहना है कि कई कारोबारों में लाभ का मार्जिन पहले से कम है और नया शुल्क उनकी लागत बढ़ा सकता है। इसी के विरोध में 2 अक्टूबर को देशभर में ‘नो UPI डे’ के आयोजन का आह्वान किया गया है। Business Standard के अनुसार महाराष्ट्र चैंबर ऑफ कॉमर्स, इंडस्ट्री एंड एग्रीकल्चर (MCCIA), ऑल इंडिया कंज्यूमर प्रोडक्ट्स डिस्ट्रीब्यूटर्स फेडरेशन, ऑल इंडिया ज्वैलर्स एंड गोल्डस्मिथ फेडरेशन, ऑल इंडिया मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन और फेडरेशन ऑफ रिटेल ट्रेडर्स वेलफेयर एसोसिएशन समेत कई संगठनों ने इस कार्यक्रम में भाग लेने की पुष्टि की है।
रिपोर्ट के अनुसार, विरोध के दौरान व्यापारी UPI QR कोड, स्कैनर और संबंधित उपकरणों को प्रतीकात्मक रूप से ढकने की योजना भी बना रहे हैं। हालांकि, यह देशभर में UPI सेवा बंद होने का सरकारी आदेश नहीं है, बल्कि व्यापारी संगठनों की ओर से प्रस्तावित विरोध कार्यक्रम है।
MDR यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट डिजिटल भुगतान स्वीकार करने से जुड़ा शुल्क है। नए ढांचे का उद्देश्य भुगतान व्यवस्था के बुनियादी ढांचे, सुरक्षा और अन्य संबंधित सेवाओं के लिए भुगतान व्यवस्था को वित्तीय रूप से टिकाऊ बनाना बताया गया है। सरकार और भुगतान व्यवस्था से जुड़े पक्षों के अनुसार उपभोक्ताओं के लिए UPI भुगतान की सुविधा जारी रहेगी।
इस बदलाव को लेकर व्यापारी संगठनों और सरकार के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं। जहां व्यापारी अतिरिक्त लागत को लेकर चिंता जता रहे हैं, वहीं नए ढांचे को UPI इकोसिस्टम के वित्तीय संचालन और बुनियादी ढांचे को बनाए रखने से जोड़ा गया है। 15 अक्टूबर से लागू होने वाले नियमों का वास्तविक प्रभाव व्यापारियों और डिजिटल भुगतान व्यवस्था पर आने वाले समय में स्पष्ट होगा।