गीता ज्ञान अमृत वर्षा: चिंता नहीं, चिंतन से होते हैं ईश्वर के दर्शन — संकर्षण शरण जी
रायपुर में माँ कामाख्या धर्मादा ट्रस्ट भारत वर्ष के संयोजन में आयोजित त्रिदिवसीय गीता ज्ञान अमृत वर्षा के दूसरे दिन गुरुदेव संकर्षण शरण जी ने श्रद्धालुओं को गीता के माध्यम से जीवन जीने की कला समझाई। उन्होंने कहा कि ईश्वर के दर्शन चिंता से नहीं, बल्कि चिंतन, प्रेम और भक्तिभाव से होते हैं। कथा में छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्षा डॉ. वर्णिका शर्मा ने भी पहुंचकर गुरुदेव का आशीर्वाद प्राप्त किया। कथा के बाद निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर में श्रद्धालुओं को चिकित्सा परामर्श दिया गया।
UNITED NEWS OF ASIA. अमृतेश्वर सिंह, रायपुर l माँ कामाख्या धर्मादा ट्रस्ट भारत वर्ष के संयोजन में आयोजित त्रिदिवसीय ‘गीता ज्ञान अमृत वर्षा’ के दूसरे दिन गुरुदेव संकर्षण शरण जी ने श्रद्धालुओं को श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से जीवन जीने की कला समझाई। गुरुदेव ने अपने प्रवचन में कहा कि ईश्वर के दर्शन चिंता से नहीं, बल्कि चिंतन से प्राप्त होते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेम, भक्ति, आत्मचिंतन और गुरु वाणी का अनुसरण करने का संदेश दिया। खराब मौसम के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा स्थल पर पहुंचे और गीता ज्ञान का श्रवण किया।
गुरुदेव संकर्षण शरण जी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण प्रेम के स्वरूप हैं और प्रेम के माध्यम से ही ईश्वर से जुड़ने का मार्ग प्रशस्त होता है। उन्होंने बताया कि यदि व्यक्ति ईश्वर के करीब जाना चाहता है, तो उसे अनावश्यक चिंताओं को छोड़कर परमात्मा, उनकी लीलाओं और गुरु वाणी का चिंतन करना चाहिए। चिंता व्यक्ति को सांसारिक उलझनों में बांधती है, जबकि चिंतन मन को शांति और भक्ति की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा कि ईश्वर की आराधना सच्चे मन से होनी चाहिए। पूजा-पाठ में दिखावा और मन में द्वेष रखने के बजाय प्रेम, समर्पण और आत्मभाव को महत्व देना चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद का उल्लेख करते हुए गुरुदेव ने समझाया कि गुरु के ज्ञान को केवल सुनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे अपने मन और हृदय में धारण करके जीवन में अपनाना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि प्रकृति की दिव्यता, सूर्य का प्रकाश, चंद्रमा की शीतलता और संसार की प्रत्येक कल्याणकारी वस्तु में ईश्वर का अनुभव किया जा सकता है। व्यक्ति को अपने भीतर के अहंकार को त्यागकर विनम्रता और भक्तिभाव के साथ जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए।
गुरुदेव ने हनुमान जी के बाल्यकाल का प्रसंग सुनाते हुए ज्ञान को जीवन का प्रकाश बताया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को बचपन से ही ज्ञान और अच्छे संस्कारों को अपनाना चाहिए। गुरु वाणी का अनुसरण करने से व्यक्ति अपनी बुराइयों और कुप्रवृत्तियों से दूर होकर सही मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए गीता ज्ञान का उदाहरण देते हुए उन्होंने जीवन की कठिन परिस्थितियों में धैर्य, विवेक और सही मार्गदर्शन के महत्व को रेखांकित किया।
इस अवसर पर छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्षा डॉ. वर्णिका शर्मा कथा स्थल पहुंचीं। उन्होंने गुरुदेव के प्रवचन का श्रवण किया और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। कथा के बाद संस्था की ओर से निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर भी आयोजित किया गया। वासुदेव मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल से पहुंचे डॉक्टरों ने श्रद्धालुओं को स्वास्थ्य संबंधी परामर्श दिया।
संस्था की मीडिया प्रभारी कल्पना शुक्ला ने बताया कि 29 अक्टूबर को त्रिदिवसीय कथा का अंतिम दिन होगा। इसके बाद 30 अक्टूबर को सुबह 7 बजे हवन के साथ आयोजन का समापन किया जाएगा। पूरे कार्यक्रम के दौरान कथा स्थल ‘जय श्रीकृष्ण’ के जयकारों से गूंजता रहा।