जानकारी के मुताबिक, झाबुआ में मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की प्रक्रिया करीब दो साल पहले शुरू की गई थी। इसके लिए राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (RGPV) के दायरे में आने वाले एक इंजीनियरिंग कॉलेज के भवन को प्रस्तावित मेडिकल कॉलेज के लिए चुना गया था। योजना के तहत जरूरी बुनियादी ढांचे और अन्य व्यवस्थाओं को विकसित करने की दिशा में प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही थी।
मेडिकल कॉलेज के संचालन के लिए शासकीय अस्पताल के साथ समझौता ज्ञापन यानी MoU की प्रक्रिया भी शुरू की गई थी। इसके अलावा प्रोजेक्ट से संबंधित तकनीकी और अन्य आवश्यक कार्यों के लिए कंसल्टेंट नियुक्त करने की दिशा में भी कदम उठाए गए थे। हालांकि, वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण अब इन सभी प्रक्रियाओं को रोक दिया गया है।
करीब 700 करोड़ रुपये की लागत वाले इस प्रोजेक्ट के लिए शुरुआती स्तर पर 20 करोड़ रुपये जुटाना भी विश्वविद्यालय के लिए चुनौती बन गया। राशि उपलब्ध नहीं होने के कारण परियोजना को आगे बढ़ाना संभव नहीं हो सका। इससे मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में विश्वविद्यालय की प्रस्तावित योजना फिलहाल ठंडे बस्ते में चली गई है।
DAVV में केवल मेडिकल कॉलेज का प्रोजेक्ट ही वित्तीय संकट से प्रभावित नहीं हुआ है। विश्वविद्यालय में पिछले कुछ वर्षों के दौरान स्वीकृत विभिन्न भवन निर्माण और विकास कार्य भी लंबे समय से लंबित बताए जा रहे हैं। जानकारी के अनुसार, करीब 99 करोड़ रुपये के अलग-अलग प्रोजेक्ट स्वीकृत किए गए थे, लेकिन इनमें से एक भी प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो सका है।
विश्वविद्यालय परिसर में कुलसचिव और कुलपति आवास के निर्माण का मामला भी लंबे समय से लंबित है। बताया जा रहा है कि इन आवासों के निर्माण की प्रक्रिया करीब 10 वर्षों से पूरी नहीं हो पाई है। इससे विश्वविद्यालय में विकास योजनाओं को समय पर पूरा करने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
दूसरी ओर, मध्य प्रदेश में नए सरकारी मेडिकल कॉलेजों के विस्तार की प्रक्रिया जारी है। राज्य सरकार प्रदेश के नौ नए सरकारी मेडिकल कॉलेजों का संचालन अपने स्तर पर करने की तैयारी में है। बुधनी, छतरपुर, उज्जैन और दमोह में मेडिकल कॉलेजों की इमारतों का निर्माण पूरा हो चुका है। मंडला और राजगढ़ में भवन निर्माण का काम जारी बताया गया है।
नीमच और सिंगरौली के मेडिकल कॉलेज केंद्र सरकार की योजना के तहत संचालित किए जाने हैं। ऐसे समय में DAVV का झाबुआ मेडिकल कॉलेज प्रोजेक्ट रुकना विश्वविद्यालय के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। फिलहाल वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता और परियोजना को दोबारा शुरू करने को लेकर आगे की स्थिति विश्वविद्यालय के स्तर पर तय होनी है।