सड़क निर्माण में जमीन प्रभावित, मुआवजा नहीं मिलने का दावा; राकेश कुमार बहेरा पहुंचे हाईकोर्ट

रायगढ़ जिले के लैलूंगा क्षेत्र में बक्रुमा-लैलूंगा सड़क परियोजना से भूमि प्रभावित होने और मुआवजा नहीं मिलने का मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहुंचा है। ग्राम राजपुर निवासी राकेश कुमार बहेरा ने रिट याचिका के जरिए प्रभावित भूमि के विधिवत अधिग्रहण और नियमानुसार मुआवजे की मांग की है। याचिका के अनुसार 2021 के हाईकोर्ट आदेश के बाद जुलाई 2026 में सीमांकन हुआ, जिसमें खसरा नंबर 380/6 की करीब 0.132 हेक्टेयर भूमि प्रभावित पाए जाने का दावा किया गया है।

Oct 7, 2026 - 18:37
 0  49
सड़क निर्माण में जमीन प्रभावित, मुआवजा नहीं मिलने का दावा; राकेश कुमार बहेरा पहुंचे हाईकोर्ट

UNITED NEWS OF ASIA. महेंद्र अग्रवाल, रायगढ़/बक्रुमा-लैलूंगा। सड़क निर्माण और चौड़ीकरण से भूमि प्रभावित होने के बावजूद मुआवजा नहीं मिलने का मामला अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर पहुंच गया है। ग्राम राजपुर, तहसील लैलूंगा, जिला रायगढ़ निवासी राकेश कुमार बहेरा ने अपनी प्रभावित भूमि के विधिवत अधिग्रहण और नियमानुसार मुआवजा दिलाने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में रिट याचिका प्रस्तुत की है। याचिका में दावा किया गया है कि बक्रुमा-लैलूंगा सड़क परियोजना के निर्माण या चौड़ीकरण में उनकी भूमि का उपयोग हुआ, लेकिन अब तक विधिवत अधिग्रहण और मुआवजे की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई है।

याचिका के अनुसार राकेश कुमार बहेरा की ग्राम राजपुर, पी.एच. नंबर 03, तहसील लैलूंगा स्थित भूमि में खसरा नंबर 380/6, 380/18 और 380/19 शामिल हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि सड़क निर्माण के लिए भूमि प्रभावित होने के बावजूद निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत भूमि अधिग्रहण नहीं किया गया और मुआवजे का भुगतान भी नहीं हुआ।

इस मामले में याचिकाकर्ता इससे पहले वर्ष 2021 में भी हाईकोर्ट पहुंच चुके हैं। याचिका में बताया गया है कि W.P.(C) No.1827/2021 में हाईकोर्ट ने 25 मार्च 2021 को संबंधित अधिकारियों को भूमि का सीमांकन करने के निर्देश दिए थे। साथ ही सड़क निर्माण या चौड़ीकरण से भूमि प्रभावित पाए जाने की स्थिति में नियमानुसार अधिग्रहण की कार्रवाई करने की बात कही गई थी। याचिका के अनुसार बिना विधिसम्मत अधिग्रहण प्रक्रिया के भूमि का जबरन उपयोग नहीं किए जाने का निर्देश भी दिया गया था।

याचिकाकर्ता के अनुसार हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद तत्काल सीमांकन नहीं हुआ और करीब पांच वर्ष बाद 11 जुलाई 2026 को भूमि का सीमांकन किया गया। याचिका में सीमांकन रिपोर्ट के हवाले से दावा किया गया है कि खसरा नंबर 380/6 की करीब 0.132 हेक्टेयर भूमि बक्रुमा-लैलूंगा सड़क परियोजना से प्रभावित पाई गई। इसी प्रभावित हिस्से में करीब 99 वर्गमीटर क्षेत्र में 9 कमरों की एक संरचना मौजूद होने की बात भी रिपोर्ट में दर्ज होने का दावा किया गया है। याचिका में इस संरचना को श्रमिक आवास के रूप में उल्लेखित किया गया है।

याचिका में कहा गया है कि सीमांकन के माध्यम से प्रभावित भूमि और संरचना की पहचान होने के बाद भी अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। इसके साथ ही प्रभावित भूमि और संरचना के मुआवजे का निर्धारण तथा भुगतान भी लंबित होने का दावा किया गया है। याचिकाकर्ता ने 7 अगस्त 2026 को संबंधित अनुविभागीय अधिकारी एवं भूमि अधिग्रहण अधिकारी के समक्ष लिखित अभ्यावेदन प्रस्तुत कर मुआवजे की मांग की थी। याचिका के अनुसार यह अभ्यावेदन भी अब तक लंबित है।

राकेश कुमार बहेरा ने अपनी याचिका में संविधान के अनुच्छेद 300-A का हवाला देते हुए कहा है कि कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के बिना किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। उनका तर्क है कि सार्वजनिक सड़क परियोजना के लिए निजी भूमि का उपयोग किए जाने की स्थिति में कानून के अनुसार अधिग्रहण और मुआवजा प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए।

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से प्रभावित भूमि के विधिवत अधिग्रहण और खसरा नंबर 380/6 की करीब 0.132 हेक्टेयर प्रभावित भूमि के साथ 99 वर्गमीटर की 9 कमरों वाली संरचना के लिए नियमानुसार मुआवजा निर्धारित कर भुगतान कराने की मांग की है। साथ ही 7 अगस्त 2026 के अभ्यावेदन पर समयबद्ध और कारणयुक्त आदेश पारित करने का निर्देश देने की मांग की गई है।

याचिका के अंतरिम आवेदन में यह आशंका भी जताई गई है कि मुआवजा निर्धारित और भुगतान किए बिना प्रभावित भूमि पर सड़क निर्माण या चौड़ीकरण का काम शुरू अथवा जारी किया जा सकता है। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने अधिग्रहण प्रक्रिया पूरी किए बिना निर्माण या चौड़ीकरण कार्य नहीं करने तथा कानून के अनुसार प्रक्रिया अपनाने की मांग की है।

अब मामले में हाईकोर्ट के समक्ष संबंधित विभागों और अधिकारियों का पक्ष महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल याचिकाकर्ता के दावों के आधार पर मुख्य सवाल यही है कि वर्ष 2021 के निर्देश के बाद सीमांकन में देरी क्यों हुई और प्रभावित भूमि की पहचान होने के बाद भी अधिग्रहण एवं मुआवजा प्रक्रिया पूरी क्यों नहीं हो सकी। मामले की आगे की न्यायिक कार्रवाई पर अब नजर रहेगी।