पगारा में 136 वर्षों से जीवंत है रामलीला की परंपरा, नवरात्रि में 10 दिनों तक होता है भव्य मंचन
धर्म नगरी पगारा में पिछले 136 वर्षों से रामलीला मंचन की परंपरा निभाई जा रही है। शारदीय नवरात्रि के दौरान दस दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में गांव के सभी समुदायों के लोग सहयोग करते हैं। नारद मोह और रावण जन्म से शुरू होकर रावण वध, श्रीराम के अयोध्या आगमन और राजतिलक तक रामलीला का मंचन किया जाता है। प्रतिदिन आरती, पूजन, जस भजन और महाप्रसाद वितरण के साथ धार्मिक आयोजन संपन्न होता है। अंतिम दिन अन्नपूर्णा समिति द्वारा विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है।
UNITED NEWS OF ASIA. वीरेंद्र यादव, छिंदवाड़ा l धर्म नगरी पगारा में धार्मिक आस्था, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक रामलीला मंचन पिछले 136 वर्षों से निरंतर किया जा रहा है। यह आयोजन केवल धार्मिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव की सांस्कृतिक विरासत और आपसी भाईचारे को मजबूत करने का माध्यम भी बना हुआ है। पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही इस परंपरा को आज भी ग्रामीण पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं। रामलीला के आयोजन में गांव के सभी समुदायों के लोगों का सहयोग प्राप्त होता है, जिससे यह कार्यक्रम सामाजिक समरसता की मिसाल बन गया है।
136 वर्षों से चली आ रही परंपरा
पगारा में रामलीला मंचन की शुरुआत पूर्वजों द्वारा की गई थी। समय के साथ पीढ़ियां बदलती रहीं, लेकिन रामलीला के प्रति लोगों की आस्था और समर्पण कायम रहा। वर्तमान में भी गांव के लोग अपने पूर्वजों की इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। रामलीला के विभिन्न पात्रों का अभिनय स्थानीय कलाकारों द्वारा किया जाता है। पात्रों के माध्यम से भगवान श्रीराम के जीवन, आदर्शों और रामायण की प्रमुख घटनाओं को मंच पर प्रस्तुत किया जाता है। इस परंपरा के जरिए नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, धार्मिक मूल्यों और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों से जुड़ने का अवसर मिलता है।
शारदीय नवरात्रि में दस दिनों तक होता है मंचन
शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व पर पगारा में दस दिनों तक लगातार रामलीला का मंचन किया जाता है। आयोजन के दौरान प्रतिदिन सुबह और शाम आरती एवं पूजन होता है। संध्या कालीन आरती के बाद जस भजन प्रस्तुत किए जाते हैं। धार्मिक वातावरण में भजन-कीर्तन के पश्चात रामलीला का मंचन शुरू होता है। गांव के श्रद्धालु बड़ी संख्या में कार्यक्रम में शामिल होकर भगवान श्रीराम की लीलाओं का आनंद लेते हैं और धर्म का पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।
नारद मोह और रावण जन्म से होती है शुरुआत
रामलीला के प्रथम दिन नारद मोह और रावण जन्म के प्रसंगों का मंचन किया जाता है। इसके बाद रामायण की विभिन्न घटनाओं को क्रमवार प्रस्तुत किया जाता है। कलाकार अपने अभिनय के माध्यम से कथा को जीवंत बनाते हैं। रामलीला में धार्मिक प्रसंगों के साथ-साथ आदर्श जीवन, कर्तव्य, सत्य और धर्म की महत्ता को भी दर्शाया जाता है। आयोजन में शामिल ग्रामीणों के लिए यह केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का महत्वपूर्ण अवसर है।
रावण वध से श्रीराम के राजतिलक तक मंचन
रामलीला का प्रमुख आकर्षण दशहरा के दिन होने वाला रावण वध का प्रसंग रहता है। इस दौरान भगवान श्रीराम की विजय और अधर्म पर धर्म की जीत का संदेश प्रस्तुत किया जाता है। इसके बाद श्रीराम के अयोध्या आगमन और राजतिलक तक की कथा का मंचन किया जाता है। इन प्रसंगों के माध्यम से दर्शकों को सत्य, न्याय, त्याग और मर्यादा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। दशहरा के अवसर पर रामलीला का समापन धार्मिक उत्साह और श्रद्धा के वातावरण में होता है।
प्रतिदिन महाप्रसाद, अंतिम दिन विशाल भंडारा
पगारा की रामलीला में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सेवा और प्रसाद वितरण की परंपरा भी विशेष महत्व रखती है। कार्यक्रम के दौरान प्रतिदिन रात्रि में महाप्रसाद का वितरण किया जाता है। इससे आयोजन में शामिल श्रद्धालुओं को प्रसाद ग्रहण करने का अवसर मिलता है। रामलीला के अंतिम दिन अन्नपूर्णा समिति द्वारा विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है। इसमें ग्रामीण बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और सामूहिक सहयोग से कार्यक्रम को सफल बनाते हैं। सेवा, सहयोग और सहभागिता की यह भावना आयोजन की विशेष पहचान है।
सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक
136 वर्षों से निरंतर आयोजित हो रही पगारा की रामलीला गांव की एकजुटता और सामूहिक प्रयासों का उदाहरण है। इस आयोजन में विभिन्न समुदायों के लोगों की सहभागिता यह संदेश देती है कि धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं समाज को जोड़ने का कार्य करती हैं। स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलता है, वहीं बच्चों और युवाओं को परंपरागत मंचन से जुड़ने की प्रेरणा मिलती है। पूर्वजों से प्राप्त इस विरासत को आगे बढ़ाने में ग्रामीणों का सहयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
रामलीला के आयोजन से गांव में भक्तिमय वातावरण निर्मित होता है और लोगों को एक साथ बैठकर धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिलता है। जस भजन, आरती, पूजन, रामलीला मंचन और महाप्रसाद वितरण के माध्यम से यह आयोजन श्रद्धा और सेवा की भावना को मजबूत करता है।
सतपुड़ा कला मंच एवं रामलीला मंडल पगारा के तत्वावधान में आयोजन
पगारा में 136 वर्षों से चली आ रही इस ऐतिहासिक रामलीला परंपरा का आयोजन सतपुड़ा कला मंच एवं रामलीला मंडल पगारा द्वारा किया जाता है। आयोजकों और ग्रामीणों के सामूहिक सहयोग से हर वर्ष शारदीय नवरात्रि के दौरान दस दिनों तक यह धार्मिक कार्यक्रम संपन्न होता है। गांव के लोग इस परंपरा को अपनी सांस्कृतिक पहचान मानते हैं और इसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए प्रयासरत हैं।
धर्म नगरी पगारा की रामलीला आज भी आस्था, परंपरा, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक संरक्षण का संदेश दे रही है। 136 वर्षों से जारी यह आयोजन बताता है कि जब समाज अपनी विरासत को मिल-जुलकर संजोता है, तो परंपराएं समय के साथ और अधिक मजबूत होती जाती हैं।