शिक्षा, भारतीय संस्कृति और राष्ट्र की पहचान पर राहुल सिंह परिहार ने रखे विचार, मानसिक गुलामी से मुक्त होने का किया आह्वान
शिवसेना यूबीटी छत्तीसगढ़ के प्रदेश उपाध्यक्ष राहुल सिंह परिहार ने शिक्षा को व्यक्ति, समाज, संस्कृति और राष्ट्र की पहचान का आधार बताया। उन्होंने भारतीय गुरुकुल परंपरा, मातृभाषा और सांस्कृतिक मूल्यों को महत्व देने की आवश्यकता पर जोर देते हुए शिक्षा में स्वार्थ की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताई। उन्होंने मैकाले की शिक्षा व्यवस्था को लेकर अपने विचार व्यक्त किए और भारतीय समाज से मानसिक गुलामी से मुक्त होकर अपनी भाषा, संस्कृति और राष्ट्र को सर्वोपरि रखने का आह्वान किया।
UNITED NEWS OF ASIA. अमृतेश्वर सिंह, रायपुर l शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की पहचान का आधार है। इसी विचार को सामने रखते हुए शिवसेना यूबीटी छत्तीसगढ़ के प्रदेश उपाध्यक्ष राहुल सिंह परिहार ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था, गुरुकुल परंपरा, सांस्कृतिक मूल्यों और राष्ट्रीय चेतना को लेकर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि शिक्षा किसी एक व्यक्ति के विकास तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह पूरे समाज, संस्कृति, राज्य और राष्ट्र के भविष्य को दिशा देने का कार्य करती है। उनके अनुसार, शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति को ज्ञानवान बनाने के साथ-साथ उसे नैतिक, जिम्मेदार और सामाजिक मूल्यों के प्रति संवेदनशील बनाना भी है।
राहुल सिंह परिहार ने भारतीय गुरुकुल शिक्षा पद्धति का उल्लेख करते हुए कहा कि पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था में व्यक्ति के सर्वांगीण विकास पर विशेष ध्यान दिया जाता था। शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति में संस्कार, अनुशासन, कर्तव्यबोध और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करने का प्रयास किया जाता था। उनका मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना या आर्थिक रूप से सक्षम बनना नहीं होना चाहिए, बल्कि व्यक्ति को अपनी संस्कृति, परंपराओं और राष्ट्रीय पहचान से भी जोड़ना चाहिए।
उन्होंने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि शिक्षा में सभी का अधिकार है, लेकिन जब इसमें व्यक्तिगत स्वार्थ को प्राथमिकता मिलने लगती है, तब इसकी मूल भावना प्रभावित होती है। उनके अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य समाज में समान अवसर उपलब्ध कराना, विचारशील नागरिक तैयार करना और मानवीय मूल्यों को मजबूत करना होना चाहिए। यदि शिक्षा केवल प्रतिस्पर्धा, व्यक्तिगत लाभ और आर्थिक सफलता तक सीमित रह जाती है, तो उसके सामाजिक और सांस्कृतिक उद्देश्य पीछे छूट सकते हैं।
राहुल सिंह परिहार ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आए ऐतिहासिक बदलावों का उल्लेख करते हुए लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति की आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था ने भारतीय भाषाओं, परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को नुकसान पहुंचाया तथा भारतीय समाज में मानसिक गुलामी की भावना को बढ़ावा दिया। उनका कहना है कि स्वतंत्र भारत में शिक्षा को इस तरह विकसित किया जाना चाहिए, जिससे विद्यार्थियों में अपनी भाषा, समाज और संस्कृति के प्रति सम्मान की भावना मजबूत हो। यह उनका वैचारिक दृष्टिकोण है, जिस पर शिक्षा और इतिहास के क्षेत्र में अलग-अलग मत भी मौजूद हैं।
उन्होंने कहा कि समय आ गया है कि भारतीय समाज अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझे और आधुनिक ज्ञान के साथ अपनी परंपराओं का संतुलित समन्वय करे। मातृभाषा में शिक्षा, नैतिक मूल्यों का विकास, सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध को शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उनके अनुसार, अपनी संस्कृति और भाषा पर गर्व करने का अर्थ दूसरी संस्कृतियों का विरोध करना नहीं, बल्कि अपनी पहचान को समझते हुए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना है।
राहुल सिंह परिहार ने समाज से आह्वान किया कि शिक्षा को केवल व्यक्तिगत स्वार्थ का साधन न बनाकर राष्ट्र निर्माण और सामाजिक विकास का माध्यम बनाया जाए। उन्होंने भारतीय संस्कृति, समाज और राष्ट्र को सर्वोपरि रखने की अपील करते हुए अपने संदेश का समापन धार्मिक एवं राष्ट्रीय उद्घोष के साथ किया। उन्होंने कहा, “जय जगदंबा भवानी, हर हर महादेव और जय हिंद।”