स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामरतन सिन्हा के नाम पर स्वागत द्वार या स्कूल का नामकरण करने की मांग

धमतरी जिले के नगरी क्षेत्र के ग्राम साकरा में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामरतन सिन्हा के नाम पर स्वागत द्वार या स्कूल का नामकरण करने की मांग उठी है। उनके नाती हितेश सिन्हा और चंपेश्वर सिन्हा ने उनके स्वतंत्रता संग्राम में योगदान और सामाजिक सेवाओं को याद करते हुए शासन-प्रशासन से यह मांग की है। रामरतन सिन्हा ने कंडेल सत्याग्रह में भाग लिया, रायपुर सेंट्रल जेल में चार महीने की सजा काटी और स्वतंत्रता के बाद भी पंचायत तथा जिला स्तर पर जनसेवा की।

Oct 24, 2026 - 11:55
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामरतन सिन्हा के नाम पर स्वागत द्वार या स्कूल का नामकरण करने की मांग

UNITED NEWS OF ASIA. रिजवान मेमन, नगरी/धमतरी l धमतरी जिले के नगरी क्षेत्र के ग्राम साकरा में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामरतन सिन्हा के नाम पर स्वागत द्वार या किसी स्कूल का नामकरण करने की मांग उठी है। उनके परिजन लंबे समय से शासन-प्रशासन से यह मांग करते आ रहे हैं, ताकि देश की आजादी और समाजसेवा में योगदान देने वाले इस सेनानी की स्मृतियों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सके। रामरतन सिन्हा के नाती चंपेश्वर सिन्हा और अटल भारतीय हिंदू फाउंडेशन के प्रदेश अध्यक्ष हितेश सिन्हा ने उनके जीवन, संघर्ष और जनसेवा से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को साझा करते हुए उनके नाम पर स्मारक स्वरूप नामकरण किए जाने की मांग की है।

परिजनों के अनुसार, रामरतन सिन्हा का जन्म 1 जून 1921 को ग्राम साकरा में हुआ था। उनके पिता पीलाराम सिन्हा कृषि कार्य करते थे। रामरतन सिन्हा ने चौथी कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की थी। इसके बाद स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति उनकी रुचि बढ़ी। बताया जाता है कि जल, जंगल और जमीन के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले उग्रवादी नेता सुखराम नागे के विचारों और समर्पण से प्रभावित होकर वे स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुए। उन्होंने कंडेल सत्याग्रह में सक्रिय भूमिका निभाई, जो लोगों के अधिकारों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण आंदोलन था।

हितेश सिन्हा और चंपेश्वर सिन्हा के अनुसार, स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम चरण में भागीदारी के कारण रामरतन सिन्हा को रायपुर सेंट्रल जेल में बंद किया गया था, जहां उन्होंने चार महीने की सजा काटी। देश की आजादी के बाद भी उन्होंने सार्वजनिक जीवन से नाता नहीं तोड़ा और समाजसेवा को अपना उद्देश्य बनाए रखा।

रामरतन सिन्हा ने वर्ष 1952 से 1962 तक जिला सदस्य के रूप में कार्य किया। 17 फरवरी 1969 को नगरी मंडी की स्थापना में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे मंडी के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। इसके अलावा उन्होंने वर्ष 1962 से 1978 तक ग्राम पंचायत साकरा के सरपंच के रूप में कार्य करते हुए ग्रामीण विकास और जनहित से जुड़े कार्यों में योगदान दिया।

उनके कार्यों और सामाजिक योगदान को देखते हुए राज्य सरकार ने 15 अगस्त 1997 को उन्हें प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया था। 12 मार्च 2013 को उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद से परिजन लगातार यह मांग कर रहे हैं कि ग्राम साकरा के स्वागत द्वार या किसी शासकीय स्कूल का नाम उनके नाम पर रखा जाए।

हितेश सिन्हा का कहना है कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का सम्मान केवल स्मरण तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनके योगदान को सार्वजनिक स्थलों और शैक्षणिक संस्थानों के माध्यम से भी संरक्षित किया जाना चाहिए। ग्राम साकरा में रामरतन सिन्हा के नाम पर स्वागत द्वार या स्कूल का नामकरण होने से नई पीढ़ी उनके संघर्ष, देशप्रेम और जनसेवा के बारे में जान सकेगी। परिजनों ने शासन-प्रशासन से मांग पर गंभीरता से विचार कर उचित निर्णय लेने की अपील की है।