राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने की आदिवासी परंपरागत व्यवस्था की सराहना, कहा—सामाजिक एकता और न्याय का उत्कृष्ट उदाहरण है मुरिया दरबार
बस्तर दशहरा के ऐतिहासिक मुरिया दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने आदिवासी समाज की परंपरागत व्यवस्था, सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक निर्णय प्रणाली की सराहना की। उन्होंने कहा कि मांझी, पीड़ परगना और देश परगना जैसी पारंपरिक व्यवस्थाएं सामाजिक एकता, आपसी सहयोग और न्याय का उदाहरण हैं। राष्ट्रपति ने शिक्षा और विकास के साथ आदिवासी संस्कृति एवं पहचान को सुरक्षित रखने तथा नक्सलवाद जैसी चुनौतियों का सामना करने के लिए समाज को एकजुट रहने का आह्वान किया।
UNITED NEWS OF ASIA. जगदलपुर। बस्तर दशहरा के ऐतिहासिक मुरिया दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने आदिवासी समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और सामूहिक निर्णय प्रणाली की सराहना की। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की परंपरागत व्यवस्था सामाजिक एकता, न्याय, आपसी सहयोग और सुशासन का उत्कृष्ट उदाहरण है। पीढ़ियों से चली आ रही यह व्यवस्था समाज में प्रेम, सद्भाव और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करती है।
मुरिया दरबार में आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों और पारंपरिक प्रमुखों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने अपने आदिवासी समाज से जुड़ाव का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वह भी मांझी की बेटी हैं। उनके दादाजी, पिताजी और भाई मांझी रहे हैं। उन्होंने कहा कि परिवार के सदस्य भले ही आज उनके बीच नहीं हैं, लेकिन आदिवासी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक व्यवस्था से उनका जुड़ाव आज भी गहरा है।
राष्ट्रपति ने कहा कि शासन व्यवस्था, नीतियों और कानूनों में समय के साथ बदलाव होते रहे हैं, लेकिन आदिवासी समाज ने अपनी परंपराओं और अलिखित सामाजिक संविधान को पीढ़ियों से जीवित रखा है। गांवों में मांझी और अन्य पारंपरिक प्रमुखों की भूमिका सामाजिक विवादों के समाधान और सामूहिक निर्णय लेने में महत्वपूर्ण रही है। जमीन-जायदाद या आपसी मतभेद जैसे मामलों में लोगों की बात सुनकर सहमति से समाधान निकालने की परंपरा सामाजिक न्याय का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
उन्होंने पीड़ परगना और देश परगना जैसी पारंपरिक संस्थाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि गांव स्तर पर समाधान नहीं निकलने पर बड़ी सामाजिक बैठकों के माध्यम से समस्याओं का निपटारा किया जाता था। कई बार निर्णय तक पहुंचने के लिए कई दिनों तक विचार-विमर्श चलता था। यह व्यवस्था आदिवासी समाज की एकता, आपसी विश्वास और सामूहिक जिम्मेदारी को दर्शाती है। राष्ट्रपति ने कहा कि जहां संभव हो और कानून के अनुरूप हो, वहां संवाद और सहमति के माध्यम से विवादों का समाधान करने का प्रयास किया जाना चाहिए।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने आदिवासी समाज की आध्यात्मिकता, प्रकृति के प्रति आस्था और सामूहिक उत्सवों की परंपरा को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि ग्राम देवी-देवताओं की पूजा, पारंपरिक नृत्य, गीत-संगीत और पर्व-त्योहार केवल धार्मिक आयोजन नहीं हैं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के माध्यम भी हैं।
नक्सलवाद की चुनौती का उल्लेख करते हुए राष्ट्रपति ने समाज के लोगों से एकजुट रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि समाज को अपने गांव, अपने भविष्य और विकास से जुड़े निर्णय स्वयं समझदारी से लेने चाहिए। आपसी एकता और सामूहिक प्रयासों से कठिन चुनौतियों का सामना किया जा सकता है।
राष्ट्रपति ने बच्चों की शिक्षा पर विशेष जोर देते हुए कहा कि आदिवासी समाज को आधुनिक शिक्षा और विकास के अवसर अपनाने चाहिए, लेकिन इसके साथ अपनी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक पहचान को भी सुरक्षित रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि विकास और सांस्कृतिक संरक्षण एक-दूसरे के पूरक हैं। पारंपरिक संस्थाओं और सामाजिक मूल्यों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना सभी की जिम्मेदारी है।
कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, राज्यपाल रमेन डेका और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को काष्ठ कला की कलाकृति स्मृति चिह्न के रूप में भेंट की गई। बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष एवं सांसद महेश कश्यप, उपाध्यक्ष बलराम मांझी तथा विभिन्न क्षेत्रों के पारंपरिक मांझियों ने भी अपने विचार रखे और राष्ट्रपति के आगमन पर आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचन्द्र भंजदेव, उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल, वन मंत्री केदार कश्यप, सांसद भोजराज नाग, विधायक किरण सिंह देव, महापौर संजय पाण्डे सहित प्रशासनिक अधिकारी, पारंपरिक मांझी-चालकी, बस्तर दशहरा समिति के सदस्य और बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। राष्ट्रपति ने बस्तर के लोगों से मिले स्नेह और सम्मान के लिए आभार व्यक्त करते हुए मुरिया दरबार जैसी ऐतिहासिक परंपराओं को संरक्षित रखने का आह्वान किया।