महासमुंद के पिथौरा में करोड़ों की शासकीय जमीन पर अवैध कब्जे का आरोप, कलेक्टर से शिकायत की तैयारी

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के पिथौरा में कॉलेज रोड और बागबाहरा रोड स्थित शासकीय वन काष्ठागार लकड़ी डिपो के सामने की बेशकीमती सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे का आरोप लगाया गया है। ग्रामीणों का दावा है कि पंचायत लहरौद की जमीन पर निजी कब्जा कर निर्माण शुरू करने की कोशिश की जा रही है। कथित तौर पर 500 रुपये के स्टांप पेपर पर 25 लाख रुपये में जमीन की खरीद-बिक्री संबंधी लिखा-पढ़ी किए जाने की बात भी सामने आई है। ग्रामीण मामले की लिखित शिकायत जिला प्रशासन से करने की तैयारी में हैं।

Oct 18, 2026 - 15:57
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महासमुंद के पिथौरा में करोड़ों की शासकीय जमीन पर अवैध कब्जे का आरोप, कलेक्टर से शिकायत की तैयारी

UNITED NEWS OF ASIA. शिखा दास, महासमुंद/ पिथौरा। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के पिथौरा में शासकीय भूमि पर कथित अवैध कब्जे का मामला सामने आया है। कॉलेज रोड और बागबाहरा रोड स्थित शासकीय वन काष्ठागार लकड़ी डिपो के ठीक सामने मौजूद बेशकीमती सरकारी जमीन पर अतिक्रमण किए जाने का आरोप लगाया गया है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, संबंधित भूमि की कीमत करोड़ों रुपये बताई जा रही है। इस मामले को लेकर क्षेत्र में नाराजगी है और ग्रामीण जल्द ही जिला प्रशासन के समक्ष लिखित शिकायत प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे हैं।

ग्रामीण सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, सड़क से लगे रिहायशी क्षेत्र में स्थित उक्त जमीन पर कथित रूप से निजी कब्जा करने के साथ निर्माण कार्य शुरू करने की कोशिश की जा रही है। बताया जा रहा है कि संबंधित भूमि पंचायत लहरौद की शासकीय जमीन है, जहां सरकारी भवन का निर्माण किए जाने के बजाय एक व्यक्ति द्वारा कब्जा कर निर्माण शुरू करने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, जमीन के स्वामित्व, सीमांकन और कथित अतिक्रमण की वास्तविक स्थिति की आधिकारिक पुष्टि संबंधित राजस्व अभिलेखों और प्रशासनिक जांच के बाद ही हो सकेगी।

ग्रामीणों का आरोप है कि शासकीय भूमि की खरीद-बिक्री से संबंधित कथित लेनदेन में 25 लाख रुपये की राशि का उल्लेख सामने आया है। सूत्रों के मुताबिक, इस संबंध में 500 रुपये के स्टांप पेपर पर लिखा-पढ़ी किए जाने की बात भी कही जा रही है। ग्रामीणों ने इस कथित लेनदेन की वैधता पर सवाल उठाते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। हालांकि, स्टांप पेपर पर हुए कथित समझौते, भुगतान और जमीन के वास्तविक स्वामित्व की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि शासकीय भूमि को निजी संपत्ति बताकर उसका क्रय-विक्रय करने या अवैध तरीके से कब्जा स्थापित करने का प्रयास किया गया है, तो मामले की गंभीरता से जांच होनी चाहिए। उनका मानना है कि सरकारी जमीन से जुड़े दस्तावेजों की जांच कर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि जमीन किस विभाग या पंचायत के नाम दर्ज है और उस पर किसी प्रकार का निर्माण करने की अनुमति दी गई है या नहीं।

ग्रामीणों ने मांग की है कि राजस्व विभाग द्वारा संबंधित भूमि का सीमांकन कराया जाए, शासकीय अभिलेखों की जांच की जाए और यदि अतिक्रमण की पुष्टि होती है तो नियमानुसार कार्रवाई करते हुए जमीन को कब्जे से मुक्त कराया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि जांच में फर्जी दस्तावेज, धोखाधड़ी या अन्य संज्ञेय अपराध के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।

इस मामले में ग्रामीण जल्द ही कलेक्टर कार्यालय महासमुंद पहुंचकर लिखित शिकायत सौंपने की तैयारी कर रहे हैं। ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन मामले को गंभीरता से लेते हुए निष्पक्ष जांच करे और शासकीय संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करे।

फिलहाल, मामले में प्रशासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया और राजस्व अभिलेखों के आधार पर स्थिति स्पष्ट होना बाकी है। यदि आरोपों की पुष्टि होती है, तो नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जा सकती है। सरकारी जमीन से जुड़े इस विवाद में अब ग्रामीणों की नजर जिला प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हुई है।