महासमुंद के शरीफाबाद में जमीन घोटाले का आरोप, जिंदा किसान को मृत बताकर जमीन हड़पने का दावा; पटवारी निलंबित, अब मास्टरमाइंड पर कार्रवाई की मांग

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के पिथौरा क्षेत्र के सांकरा शरीफाबाद में शासकीय पट्टे की जमीन पर कथित अनियमितता का मामला सामने आया है। आरोप है कि खसरा नंबर 323 की 1.65 हेक्टेयर जमीन के मामले में जिंदा किसान को मृत बताकर जमीन हड़पने की कोशिश की गई। मामले में पटवारी राजेंद्र डोंगरे को सात अक्टूबर को निलंबित किए जाने की जानकारी सामने आई है। अब पीड़ित किसानों ने कथित रूप से शामिल अन्य लोगों की भूमिका की जांच और निष्पक्ष कार्रवाई की मांग उठाई है। हालांकि, मामले में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और अन्य लोगों की संलिप्तता का आधिकारिक निष्कर्ष उपलब्ध जानकारी में स्पष्ट नहीं है।

Oct 14, 2026 - 09:17
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महासमुंद के शरीफाबाद में जमीन घोटाले का आरोप, जिंदा किसान को मृत बताकर जमीन हड़पने का दावा; पटवारी निलंबित, अब मास्टरमाइंड पर कार्रवाई की मांग

UNITED NEWS OF ASIA. शिखा दास, महासमुंद l छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के पिथौरा क्षेत्र के सांकरा शरीफाबाद में शासकीय पट्टे की जमीन से जुड़ा विवाद सामने आया है। इस मामले में जमीन के दस्तावेजों में कथित गड़बड़ी और एक जीवित किसान को मृत दर्शाकर जमीन हड़पने की कोशिश किए जाने का आरोप लगाया गया है। मामले को लेकर क्षेत्र के किसानों में नाराजगी बताई जा रही है। किसानों का कहना है कि जमीन से जुड़े इस विवाद की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और केवल एक कर्मचारी पर कार्रवाई करके मामले को समाप्त नहीं किया जाना चाहिए।

खसरा नंबर 323 की जमीन को लेकर विवाद

प्राप्त जानकारी के अनुसार, विवाद शासकीय पट्टे की जमीन खसरा नंबर 323 से संबंधित है, जिसका रकबा 1.65 हेक्टेयर बताया गया है। आरोप है कि इस जमीन को लेकर राजस्व अभिलेखों में ऐसी अनियमितता की गई, जिसमें जीवित किसान को मृत दर्शाए जाने का मामला सामने आया। किसानों का आरोप है कि इस तरह की कथित गड़बड़ी के माध्यम से जमीन पर दूसरे पक्ष का अधिकार स्थापित करने की कोशिश की गई। हालांकि, जमीन के दस्तावेजों में वास्तव में क्या बदलाव किए गए, इसके पीछे कौन-कौन लोग शामिल थे और पूरे मामले में किसकी क्या भूमिका रही, इसकी पुष्टि आधिकारिक जांच और संबंधित अभिलेखों से ही हो सकेगी।

पटवारी के निलंबन के बाद भी उठ रहे सवाल

इस मामले में खबर सामने आने के बाद प्रशासन की ओर से पटवारी राजेंद्र डोंगरे को सात अक्टूबर को निलंबित किए जाने की जानकारी दी गई है। कार्रवाई के बाद भी किसानों की नाराजगी कम नहीं हुई है। उनका कहना है कि यदि जमीन से जुड़े दस्तावेजों में गंभीर अनियमितता हुई है, तो इसकी जांच केवल संबंधित पटवारी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। किसानों ने कथित तौर पर इस पूरे मामले में अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच करने की मांग उठाई है।

पीड़ित पक्ष का सवाल है कि यदि किसी किसान की जमीन से संबंधित दस्तावेजों में गलत जानकारी दर्ज की गई, तो इसकी प्रक्रिया में किन लोगों की भूमिका रही और संबंधित स्तरों पर दस्तावेजों की जांच कैसे हुई? किसानों की मांग है कि राजस्व विभाग के अधिकारी पूरे प्रकरण के रिकॉर्ड की जांच करें, संबंधित पक्षों के बयान दर्ज करें और तथ्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय करें।

जनप्रतिनिधियों के नाम लेकर लगाए गए आरोप

इस मामले को लेकर सामने आई रिपोर्ट में पीड़ित किसानों की ओर से जनपद अध्यक्ष के पति पुरुषोत्तम धृतलहरे और बसना विधायक संपत अग्रवाल के नाम का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में सवाल उठाया गया है कि क्या इस प्रकरण में प्रभावशाली लोगों का संरक्षण प्राप्त करने वाले किसी समूह की भूमिका है। हालांकि, इन नामों के संबंध में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी में नहीं है। संबंधित व्यक्तियों की भूमिका को लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष भी प्रस्तुत जानकारी से स्थापित नहीं होता।

इसलिए पूरे मामले में आवश्यक है कि किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध निष्कर्ष निकालने से पहले दस्तावेजी साक्ष्यों, संबंधित पक्षों के बयानों और प्रशासनिक जांच को आधार बनाया जाए। यदि किसी की संलिप्तता सामने आती है, तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। वहीं, जिन लोगों पर आरोप लगाए गए हैं, उनका पक्ष और जांच के निष्कर्ष भी सार्वजनिक होना जरूरी है, ताकि मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।

किसानों ने उठाए तीन बड़े सवाल

सांकरा शरीफाबाद के इस कथित जमीन विवाद में किसानों की ओर से प्रशासन के सामने कई सवाल रखे गए हैं। पहला सवाल यह है कि पटवारी के निलंबन के बाद कथित रूप से जमीन हड़पने की कोशिश में शामिल अन्य लोगों की जांच कब और किस स्तर पर होगी। दूसरा सवाल यह है कि क्या मामले में प्रभावशाली लोगों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच की जाएगी या कार्रवाई केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित रहेगी। तीसरा सवाल यह है कि यदि जांच में धोखाधड़ी या अन्य आपराधिक कृत्य प्रमाणित होते हैं, तो संबंधित लोगों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करने की कार्रवाई कब होगी।

रिपोर्ट में धोखाधड़ी के साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई की मांग का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, इस अधिनियम के तहत कार्रवाई संबंधित तथ्यों, पीड़ित की कानूनी स्थिति और कानून में निर्धारित आवश्यक शर्तों के आधार पर ही की जा सकती है।

निष्पक्ष जांच और किसानों को न्याय दिलाने की मांग

जमीन से जुड़े विवाद ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की आजीविका और सामाजिक सुरक्षा से सीधे जुड़े होते हैं। ऐसे मामलों में राजस्व अभिलेखों की पारदर्शिता, दस्तावेजों का सही सत्यापन और शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई बेहद महत्वपूर्ण है। यदि किसी किसान की जमीन से संबंधित रिकॉर्ड में गलत जानकारी दर्ज की गई है, तो उसकी जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

सांकरा शरीफाबाद के मामले में भी किसानों की मांग है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की जाए और जिम्मेदार पाए जाने वाले लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई हो। साथ ही, यदि किसी किसान के भूमि अधिकारों को प्रभावित किया गया है, तो संबंधित अभिलेखों की जांच कर नियमानुसार उचित राहत देने पर भी विचार किया जाए।

फिलहाल, उपलब्ध जानकारी के आधार पर पटवारी के निलंबन और किसानों की ओर से उठाए गए सवाल प्रमुख बिंदु हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन मामले की आगे कितनी गहराई से जांच करता है और जमीन से जुड़े विवाद में अन्य संभावित जिम्मेदार लोगों की भूमिका को लेकर क्या तथ्य सामने आते हैं। किसानों को उम्मीद है कि जांच निष्पक्ष होगी, राजस्व व्यवस्था में जवाबदेही तय होगी और यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो दोषियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।