कवर्धा में वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन प्रशिक्षण शुरू, वनांचल के 30 युवा कृषक सीखेंगे स्वरोजगार की तकनीक
कबीरधाम जिले में ग्रामीण युवाओं को कृषि आधारित स्वरोजगार से जोड़ने के उद्देश्य से कृषि विज्ञान केन्द्र, कवर्धा में वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन पर तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया गया है। 15 से 17 अक्टूबर 2026 तक आयोजित इस प्रशिक्षण में बोदलपानी और जमुनपानी के 30 युवा कृषक भाग ले रहे हैं। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें केंचुआ खाद उत्पादन, जैविक अपशिष्ट प्रबंधन, गुणवत्ता बनाए रखने, भंडारण और विपणन की वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक जानकारी दी जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन ग्रामीण युवाओं के लिए अतिरिक्त आय और स्वरोजगार का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
UNITED NEWS OF ASIA. सौरभ नामदेव, कवर्धा। ग्रामीण युवाओं को कृषि आधारित आजीविका से जोड़ने और स्वरोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से कृषि विज्ञान केन्द्र, कवर्धा में वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन पर तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के अंतर्गत संचालित कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा सरल योजना के तहत आयोजित यह प्रशिक्षण 15 से 17 अक्टूबर 2026 तक चल रहा है। इसमें कबीरधाम जिले के वनांचल क्षेत्र बोदलपानी और जमुनपानी के 30 युवा कृषक हिस्सा ले रहे हैं।
जैविक खाद उत्पादन से आय बढ़ाने पर जोर
प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के निदेशक विस्तार सेवाएं डॉ. एस. एस. टुटेजा और अटारी, जबलपुर के निदेशक डॉ. एस. आर. के. सिंह के मार्गदर्शन तथा कृषि विज्ञान केन्द्र, कवर्धा के प्रमुख डॉ. बी. पी. त्रिपाठी के नेतृत्व में किया जा रहा है। कार्यक्रम के शुभारंभ अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में संत कबीर कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, कवर्धा के अधिष्ठाता डॉ. राजीव श्रीवास्तव उपस्थित रहे। केन्द्र प्रमुख डॉ. बी. पी. त्रिपाठी ने अतिथि और प्रशिक्षणार्थियों का स्वागत करते हुए प्रशिक्षण के उद्देश्यों तथा ग्रामीण युवाओं के कौशल विकास में इसकी उपयोगिता के बारे में जानकारी दी।
डॉ. राजीव श्रीवास्तव ने कहा कि वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन जैविक अपशिष्टों के बेहतर उपयोग, मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार और कृषि उत्पादन की लागत कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ग्रामीण युवा इस तकनीक को अपनाकर कम लागत में स्वरोजगार शुरू कर सकते हैं। वर्मी कम्पोस्ट के उत्पादन और विपणन के माध्यम से वे अपनी आय में वृद्धि कर सकते हैं। उन्होंने प्रशिक्षणार्थियों से प्रशिक्षण के दौरान प्राप्त तकनीकी ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग कर इसे आजीविका के साधन के रूप में विकसित करने का आह्वान किया।
वैज्ञानिक तकनीक और विपणन की दी जा रही जानकारी
प्रशिक्षण के दौरान कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक युवाओं को वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन की वैज्ञानिक विधियों की जानकारी दे रहे हैं। इसमें उपयुक्त केंचुआ प्रजातियों का चयन, वर्मी बेड की स्थापना, जैविक अपशिष्टों का प्रबंधन, नमी और तापमान का उचित रखरखाव, तैयार खाद की गुणवत्ता तथा वर्मीवास के उपयोग जैसे विषय शामिल हैं। इसके अलावा तैयार खाद के भंडारण और विपणन के संबंध में भी तकनीकी एवं व्यावहारिक मार्गदर्शन दिया जा रहा है।
प्रशिक्षणार्थियों को वर्मीकम्पोस्ट इकाई स्थापित करने, उत्पादन प्रक्रिया समझने और इसे लाभकारी उद्यम के रूप में विकसित करने के तरीके भी बताए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य युवाओं को उपलब्ध जैविक संसाधनों का बेहतर उपयोग करने तथा टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है।
वनांचल के युवाओं को मिलेगा स्वरोजगार का अवसर
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में वनांचल क्षेत्र के 30 युवा कृषकों की सहभागिता ग्रामीण स्तर पर कृषि आधारित उद्यमिता को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन के माध्यम से युवा खेती के साथ आय का अतिरिक्त स्रोत विकसित कर सकते हैं। कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ. बी. एस. परिहार, डॉ. टी. एस. सोनवानी और डॉ. एन. सी. बंजारा सहित कार्यक्रम सहायक योगेश कुमार कौशिक उपस्थित रहे। प्रशिक्षण का आयोजन एवं समन्वय केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ. सी. पी. राहंगडाले द्वारा किया जा रहा है।