दशहरा 2026: महाराष्ट्र में क्यों बांटे जाते हैं आपटा के पत्ते, जिन्हें माना जाता है सोना? जानें धार्मिक मान्यता

विजयादशमी पर महाराष्ट्र में आपटा के पत्तों को सोने का प्रतीक मानकर बांटने की परंपरा निभाई जाती है। लोककथा के अनुसार, इसका संबंध ऋषि कौत्स, गुरु वरतंतु, राजा रघु और धन के देवता कुबेर से जुड़ी कथा से है। जानें इस परंपरा का धार्मिक महत्व और दशहरे पर शमी पूजन की मान्यता।

Oct 19, 2026 - 13:30
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दशहरा 2026: महाराष्ट्र में क्यों बांटे जाते हैं आपटा के पत्ते, जिन्हें माना जाता है सोना? जानें धार्मिक मान्यता

UNITED NEWS OF ASIA. भारत में विजयादशमी यानी दशहरे का पर्व अलग-अलग राज्यों में स्थानीय परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मनाया जाता है। उत्तर भारत के कई हिस्सों में रामलीला और रावण दहन इस पर्व के प्रमुख आकर्षण होते हैं, वहीं महाराष्ट्र में आपटा के पत्तों को सोने का प्रतीक मानकर बांटने की विशेष परंपरा है। इसके साथ ही कई क्षेत्रों में शमी पूजन, शस्त्र पूजन और सीमोल्लंघन भी किया जाता है। वर्ष 2026 में विजयादशमी 20 अक्टूबर, मंगलवार को मनाई जाएगी।

आपटा के पत्तों को सोना मानकर बांटने की परंपरा

महाराष्ट्र में दशहरे के दिन लोग अपने रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों से मिलकर आपटा के पत्ते देते हैं। इन्हें प्रतीकात्मक सोना माना जाता है। इस परंपरा के पीछे एक प्रचलित धार्मिक लोककथा बताई जाती है, जिसका संबंध ऋषि कौत्स, उनके गुरु वरतंतु और राजा रघु से है।

लोककथा के अनुसार, शिक्षा पूरी करने के बाद ऋषि कौत्स ने अपने गुरु वरतंतु को गुरु दक्षिणा देने की इच्छा जताई। गुरु ने उनसे 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं मांगीं। इतनी बड़ी राशि जुटाने के लिए कौत्स राजा रघु के पास पहुंचे। राजा रघु अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्ध थे, लेकिन उस समय वह अपना अधिकांश धन दान कर चुके थे। इसके बावजूद कौत्स को खाली हाथ नहीं लौटाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने धन के देवता कुबेर से सहायता मांगी।

कथा के एक प्रचलित रूप में आपटा और शमी के वृक्षों से जुड़ी स्वर्ण मुद्राओं की घटना का वर्णन मिलता है। कौत्स ने गुरु दक्षिणा देने के बाद बची हुई मुद्राएं लोगों में बांट दीं। इसी लोककथा को दशहरे पर आपटा के पत्तों को सोने का प्रतीक मानकर बांटने की परंपरा से जोड़ा जाता है।

‘सोना घ्या, सोन्यासारखे रहा’ का क्या है अर्थ?

महाराष्ट्र में आपटा के पत्ते देते समय लोग मराठी में कहते हैं, ‘सोना घ्या, सोन्यासारखे रहा।’ इसका भावार्थ है—सोना स्वीकार करें और सोने की तरह मूल्यवान बने रहें। इस परंपरा का उद्देश्य केवल धन या वैभव की कामना करना नहीं, बल्कि अपने प्रियजनों के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और उन्नति की मंगलकामना करना भी है।

इस रस्म की खास बात यह है कि इसमें किसी महंगे उपहार की आवश्यकता नहीं होती। आपटा का एक छोटा-सा पत्ता भी प्रेम, सम्मान, अपनत्व और शुभकामनाओं का प्रतीक बन जाता है। यह परंपरा लोगों को आपसी संबंध मजबूत करने और त्योहार की खुशियां साझा करने का संदेश देती है।

दशहरे पर शमी पूजन का भी विशेष महत्व

विजयादशमी के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है। धार्मिक मान्यताओं में शमी को साहस, शक्ति और विजय का प्रतीक माना जाता है। महाभारत की प्रचलित कथा के अनुसार, पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान अस्त्र-शस्त्र शमी के वृक्ष में छिपाए थे। अज्ञातवास पूरा होने के बाद उन्होंने उसी वृक्ष से अपने हथियार वापस लिए थे। इसी मान्यता के कारण दशहरे पर शमी पूजन और शस्त्र पूजन का महत्व बताया जाता है।

देशभर में अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है दशहरा

विजयादशमी का मूल संदेश अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई की विजय है। महाराष्ट्र में आपटा के पत्ते बांटने की परंपरा इसी मंगलभाव को दर्शाती है। वहीं, शमी पूजन और शस्त्र पूजन के माध्यम से साहस, सुरक्षा और विजय की कामना की जाती है। इस तरह दशहरा केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, सद्भाव, समृद्धि और सकारात्मक शुरुआत का संदेश देने वाला त्योहार भी है।