छत्तीसगढ़ वन विभाग के 250 करोड़ के टेंडर पर सवाल, रायपुर के फाइव स्टार होटल में ठेकेदारों की कथित बैठक से मचा बवाल

छत्तीसगढ़ वन विभाग में प्रस्तावित करीब 250 करोड़ रुपये के टेंडर और सप्लाई कार्यों को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। दावा किया जा रहा है कि रायपुर के एक फाइव स्टार होटल में ठेकेदारों की बैठक आयोजित कर टेंडर आवंटन और कथित कमीशन पर चर्चा की गई। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

Oct 15, 2026 - 08:07
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छत्तीसगढ़ वन विभाग के 250 करोड़ के टेंडर पर सवाल, रायपुर के फाइव स्टार होटल में ठेकेदारों की कथित बैठक से मचा बवाल

UNITED NEWS OF ASIA. विशु तिवारी, बिलासपुर l छत्तीसगढ़ वन विभाग में प्रस्तावित करोड़ों रुपये के टेंडर और सामग्री आपूर्ति कार्यों को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। दावा किया जा रहा है कि वन विभाग से जुड़े कुछ ठेकेदारों ने रायपुर के फाइव स्टार होटल हयात में कथित रूप से एक बैठक आयोजित की, जिसमें आगामी टेंडरों के आवंटन, शर्तों और कमीशन को लेकर चर्चा हुई। इस कथित बैठक को लेकर विभागीय कार्यप्रणाली और सरकारी खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि बैठक के उद्देश्य, प्रतिभागियों और कथित लेनदेन संबंधी आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

प्राप्त जानकारी में दावा किया गया है कि वन विभाग में आगामी मार्च तक लगभग 250 करोड़ रुपये के सप्लाई और टेंडर संबंधी कार्य प्रस्तावित हैं। आरोप है कि इन कार्यों के आवंटन को प्रभावित करने के उद्देश्य से कुछ ठेकेदारों और संबंधित व्यक्तियों के बीच बंद कमरे में बैठकें आयोजित की गईं। बताया जा रहा है कि 14 अक्टूबर को रायपुर के होटल हयात में दोपहर करीब ढाई बजे एक ऐसी ही बैठक हुई, जिसमें टेंडर प्रक्रिया और संभावित कार्य आवंटन पर चर्चा किए जाने का दावा किया गया है।

इस पूरे मामले में प्रियदर्शन ग्रहाचार्य, कीर्ति पाढ़ी और शैलाभ साहू के नाम सामने आए हैं। आरोपों के अनुसार, प्रियदर्शन ग्रहाचार्य ने कथित बैठक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें आरएफपी और गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस यानी GeM प्रक्रिया का जानकार बताया गया है। वहीं, कीर्ति पाढ़ी और शैलाभ साहू की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप लगाने वालों का दावा है कि कुछ व्यक्तियों के माध्यम से टेंडर आवंटन और कथित कमीशन की व्यवस्था पर चर्चा की गई। इन दावों के समर्थन में फिलहाल कोई सत्यापित दस्तावेज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं कराया गया है।

मामले में वन मंत्री केदार कश्यप का नाम भी आरोपों में जोड़ा गया है। दावा किया गया है कि कथित कमीशन व्यवस्था में मंत्री से जुड़े व्यक्तियों की भूमिका थी। हालांकि केदार कश्यप की संलिप्तता या किसी कमीशन व्यवस्था में भागीदारी की पुष्टि करने वाला स्वतंत्र प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए इन आरोपों को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।

कथित बैठक को लेकर यह भी दावा किया गया है कि टेंडर की शर्तों को इस प्रकार निर्धारित करने पर चर्चा हुई, जिससे कुछ चुनिंदा ठेकेदारों को ही काम मिल सके। आरोपों के मुताबिक वन विभाग में पोल यानी खंभों की सप्लाई का काम सात ठेकेदारों और बार्बेड वायर तथा चेन लिंक की सप्लाई का काम दस व्यापारियों के बीच बांटने की योजना बनाई गई। अन्य सामग्री की आपूर्ति छोटे ठेकेदारों को देने पर चर्चा होने का भी दावा किया गया है।

इसके अतिरिक्त आरोप लगाया गया है कि कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं को काम दिलाने के लिए अन्य ठेकेदारों को केवल टेंडर भरने और बिल तैयार करने की भूमिका में रखा जा सकता है। कथित रूप से कमीशन की अग्रिम राशि को लेकर भी बैठक में असहमति सामने आने की बात कही गई है। हालांकि इन विवरणों की पुष्टि के लिए बैठक के रिकॉर्ड, संबंधित दस्तावेज और प्रतिभागियों के बयान आवश्यक हैं।

सरकारी टेंडर प्रक्रिया में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा, समान अवसर और पारदर्शिता बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यदि किसी निविदा की शर्तें विशेष व्यक्तियों या कंपनियों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से तैयार की जाती हैं, तो यह गंभीर जांच का विषय हो सकता है।

फिलहाल कथित बैठक, प्रस्तावित टेंडरों और कमीशन संबंधी आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए वन विभाग, संबंधित अधिकारियों, ठेकेदारों और आरोपों में नामित व्यक्तियों का पक्ष सामने आना जरूरी है। निष्पक्ष जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और क्या सरकारी निविदा प्रक्रिया को प्रभावित करने का कोई प्रयास हुआ था।