बस्तर के ढोकरा शिल्प को मिलेगी राष्ट्रीय पहचान, चिलकुटी बनेगा मॉडल प्रीमियम क्लस्टर

छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले की पारंपरिक ढोकरा (बेलमेटल) कला को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने की पहल शुरू हो गई है। भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय की उच्चस्तरीय टीम ने जगदलपुर विकासखंड के ग्राम चिलकुटी का दौरा कर शिल्पकारों की कार्यप्रणाली और क्लस्टर विकास की संभावनाओं का जायजा लिया। योजना के तहत चिलकुटी को मॉडल प्रीमियम क्लस्टर के रूप में विकसित करने, आधुनिक निर्माण इकाई स्थापित करने, उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने और राष्ट्रीय बाजार तक पहुंच बढ़ाने की तैयारी है।

Oct 12, 2026 - 16:24
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बस्तर के ढोकरा शिल्प को मिलेगी राष्ट्रीय पहचान, चिलकुटी बनेगा मॉडल प्रीमियम क्लस्टर

UNITED NEWS OF ASIA. बस्तर l छत्तीसगढ़ के बस्तर की पारंपरिक ढोकरा (बेलमेटल) कला को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल शुरू हुई है। भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय की योजना के अंतर्गत बस्तर के ढोकरा शिल्प क्लस्टर को प्रीमियम क्लस्टर के रूप में विकसित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इस पहल का उद्देश्य पारंपरिक आदिवासी शिल्प को संरक्षित करने के साथ शिल्पकारों को बेहतर सुविधाएं, बाजार और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना है।

रायपुर में 10 अक्टूबर 2026 को जारी जानकारी के अनुसार, कलेक्टर आकाश छिकारा के मार्गदर्शन में जिला प्रशासन के समन्वय से मंत्रालय की उच्चस्तरीय टीम ने बस्तर जिले के जगदलपुर विकासखंड स्थित ग्राम चिलकुटी का दौरा किया। केंद्रीय दल का नेतृत्व जनजातीय कार्य मंत्रालय के अवर सचिव डॉ. सुधीर कुमार ने किया। उनके साथ प्रोजेक्ट एसोसिएट एवं सलाहकार नौरिन शाहिद तथा क्लस्टर डेवलपमेंट एक्सपर्ट जागेश्वर भी मौजूद रहे। टीम ने गांव में पहुंचकर ढोकरा शिल्प के विकास की संभावनाओं और स्थानीय कारीगरों की जरूरतों का जायजा लिया।

शिल्पकारों से चर्चा कर समझी पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया

दौरे के दौरान आदिवासी विकास विभाग और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के समन्वय से अधिकारियों ने स्थानीय आदिवासी शिल्पकार परिवारों से सीधा संवाद किया। टीम ने ढोकरा कला तैयार करने की पारंपरिक प्रक्रिया को करीब से देखा और समझा। इसमें मोम से बारीक सांचे तैयार करना, उन पर मिट्टी का लेप चढ़ाना और इसके बाद धातु की ढलाई करना शामिल है। यह पारंपरिक तकनीक कारीगरों के कौशल, अनुभव और पीढ़ियों से चली आ रही कला का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

अधिकारियों ने वन विभाग द्वारा कारीगरों के लिए तैयार किए गए सामुदायिक भवन में संचालित गतिविधियों का भी अवलोकन किया। इस दौरान शिल्प निर्माण से जुड़ी व्यवस्थाओं और भविष्य में क्लस्टर को विकसित करने की संभावनाओं पर ध्यान दिया गया।

चिलकुटी में बनेगा मॉडल प्रीमियम क्लस्टर

जनजातीय कार्य मंत्रालय की योजना के तहत चिलकुटी को एक समग्र मॉडल प्रीमियम क्लस्टर के रूप में स्थापित करने की मंशा है। इसके लिए एक वर्षीय कार्ययोजना तैयार की जाएगी। प्रस्तावित योजना में एकीकृत परिसर के भीतर आधुनिक ढोकरा निर्माण इकाई, सामग्री भंडारण केंद्र और इन्वेंट्री मैनेजमेंट सिस्टम विकसित करने की तैयारी है। इससे कच्चे माल की उपलब्धता, सामग्री के व्यवस्थित रखरखाव और उत्पादन प्रक्रिया को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

योजना के तहत ढोकरा उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने के साथ उनकी ब्रांडिंग और पैकेजिंग को भी आधुनिक बाजार की जरूरतों के अनुरूप विकसित किया जाएगा। इससे पारंपरिक कला से तैयार उत्पादों को अधिक व्यवस्थित तरीके से बाजार में प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा।

राष्ट्रीय बाजार से जुड़ेंगे स्थानीय कारीगर

इस पहल में बस्तर कला गुड़ी एक्सपीरियंस जोन को सशक्त मार्केटिंग हब के रूप में विकसित करने की योजना भी शामिल है। इसका उद्देश्य स्थानीय शिल्पकारों को सीधे राष्ट्रीय बाजारों से जोड़ना और उनके उत्पादों की पहुंच बढ़ाना है। बेहतर विपणन व्यवस्था से कारीगरों को अपने उत्पादों के लिए नए खरीदार तलाशने तथा पारंपरिक कला को व्यापक पहचान दिलाने में मदद मिल सकती है।

बस्तर की ढोकरा कला अपनी पारंपरिक निर्माण तकनीक और विशिष्ट शिल्प शैली के लिए जानी जाती है। चिलकुटी में प्रस्तावित प्रीमियम क्लस्टर के विकास से इस कला के संरक्षण, उत्पादन व्यवस्था में सुधार और शिल्पकारों की आजीविका को मजबूती देने की संभावनाएं हैं। अब आगे की कार्ययोजना और उसके क्रियान्वयन से तय होगा कि यह पहल स्थानीय कारीगरों को राष्ट्रीय बाजार में कितने व्यापक अवसर उपलब्ध करा पाती है।