‘आदिम जाति विकास विभाग’ का नाम यथावत रखे सरकार, बिन्दा नेताम ने जताई आपत्ति
पूर्व जिला पंचायत सदस्य एवं छत्तीसगढ़ महिला कांग्रेस की पूर्व महामंत्री बिन्दा नेताम ने ‘आदिम जाति विकास विभाग’ का नाम बदलकर ‘जनजाति कार्य विभाग’ किए जाने पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि ‘आदिम जाति’ शब्द आदिवासी समाज की प्राचीन सभ्यता और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है। नाम परिवर्तन से भावी पीढ़ियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका व्यक्त करते हुए उन्होंने सरकार से निर्णय वापस लेने की मांग की। साथ ही उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों में जंगलों की कटाई, खनन, सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाओं की स्थिति पर भी सवाल उठाए।
UNITED NEWS OF ASIA. रिजवान मेमन, धमतरी l प्रदेश में ‘आदिम जाति विकास विभाग’ का नाम बदलकर ‘जनजाति कार्य विभाग’ किए जाने को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस शुरू हो गई है। पूर्व जिला पंचायत सदस्य एवं छत्तीसगढ़ महिला कांग्रेस की पूर्व महामंत्री बिन्दा नेताम ने सरकार के इस फैसले पर आपत्ति जताते हुए विभाग का पुराना नाम यथावत रखने की मांग की है। उन्होंने कहा कि ‘आदिम जाति’ शब्द आदिवासी समाज की प्राचीन सभ्यता, संस्कृति और ऐतिहासिक पहचान से जुड़ा हुआ है। ऐसे में विभाग के नाम में बदलाव को लेकर सरकार को समाज की भावनाओं और सांस्कृतिक महत्व पर विचार करना चाहिए।
बिन्दा नेताम के अनुसार, किसी विभाग का नाम केवल प्रशासनिक पहचान नहीं होता, बल्कि वह समाज की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ा हो सकता है। उन्होंने आशंका जताई कि ‘आदिम जाति’ शब्द को हटाने से भावी पीढ़ियों के बीच इस शब्द से जुड़ी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान प्रभावित हो सकती है। उन्होंने सरकार से निर्णय पर पुनर्विचार करने और विभाग का नाम पहले की तरह बनाए रखने की मांग की है।
आदिवासी क्षेत्रों की समस्याओं पर भी उठाए सवाल
बिन्दा नेताम ने आदिवासी क्षेत्रों में विकास कार्यों और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि जंगलों की कटाई और खनन गतिविधियों के विस्तार से आदिवासी समुदायों के पारंपरिक जीवन और आजीविका के साधनों पर असर पड़ रहा है। उनके मुताबिक, जंगल आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपराओं और जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे में विकास से जुड़ी योजनाओं में स्थानीय समुदायों के हितों और पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि कई आदिवासी क्षेत्रों में सड़क, बिजली, पेयजल, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने की जरूरत है। उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए निर्धारित निधियों के उपयोग पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि योजनाओं का लाभ जरूरतमंद लोगों तक प्रभावी ढंग से पहुंचना चाहिए। हालांकि, इन आरोपों के संबंध में संबंधित विभागों के आधिकारिक आंकड़ों और सरकार के पक्ष की जानकारी सामने आना बाकी है।
फैसला वापस लेने की मांग
बिन्दा नेताम ने सरकार पर आदिवासी समाज की भावनाओं और समस्याओं की अनदेखी करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि विभाग के नाम में बदलाव करने से पहले समाज के प्रतिनिधियों और संबंधित पक्षों से संवाद किया जाना चाहिए था। उनके अनुसार, आदिवासी समाज की पहचान, परंपराओं और अधिकारों से जुड़े विषयों पर निर्णय लेते समय संवेदनशीलता बरतना आवश्यक है।
उन्होंने सरकार से विभाग का नाम बदलने के फैसले को वापस लेने की मांग करते हुए चेतावनी दी कि यदि इस मुद्दे पर समाज की मांगों को नजरअंदाज किया गया, तो आदिवासी समाज लोकतांत्रिक तरीके से अपना विरोध दर्ज करा सकता है।
बिन्दा नेताम के बयान के बाद विभाग के नाम परिवर्तन का मुद्दा चर्चा में आ गया है। अब इस विषय पर सरकार की प्रतिक्रिया और आगे की कार्रवाई पर नजर रहेगी। फिलहाल उनकी प्रमुख मांग है कि ‘आदिम जाति विकास विभाग’ का नाम यथावत रखा जाए और आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान तथा विकास से जुड़ी समस्याओं पर गंभीरता से विचार किया जाए।