कोंडागांव में दशहरे की अनोखी परंपरा, रावण दहन नहीं बल्कि होता है वध, नाभि से निकले 'अमृत' का तिलक लगाते हैं ग्रामीण
छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले के ग्राम भूमका और हिर्री में दशहरा मनाने की अनोखी परंपरा है। यहां रावण का पुतला जलाने के बजाय मिट्टी की प्रतिमा बनाकर उसका वध किया जाता है। इसके बाद रावण की नाभि में रखे लाल रंग के द्रव्य को प्रतीकात्मक अमृत मानकर ग्रामीण माथे पर तिलक लगाते हैं। इस परंपरा को देखने बड़ी संख्या में लोग पहुंचे।
UNITED NEWS OF ASIA. रामकुमार भारद्वाज, कोंडागांव l छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले में दशहरा पर्व मनाने की एक अनोखी परंपरा आज भी जीवित है। जहां देश के अधिकांश हिस्सों में विजयदशमी के अवसर पर रावण के पुतले का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, वहीं कोंडागांव जिले के ग्राम भूमका और हिर्री में दशहरा मनाने का तरीका बिल्कुल अलग है। यहां रावण का पुतला जलाया नहीं जाता, बल्कि मिट्टी से उसकी प्रतिमा बनाकर रामलीला के दौरान विधि-विधान से रावण वध किया जाता है। इसके बाद रावण की नाभि से निकले लाल रंग के द्रव्य को प्रतीकात्मक अमृत मानकर ग्रामीण अपने माथे पर तिलक लगाते हैं। इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए 20 अक्टूबर को दशहरा पर्व के अवसर पर आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और ग्रामीण पहुंचे।
ग्राम भूमका और हिर्री में लंबे समय से चली आ रही इस परंपरा का ग्रामीण आज भी पूरी आस्था और उत्साह के साथ निर्वहन करते हैं। दशहरा पर्व के लिए विशेष रूप से मिट्टी से रावण की प्रतिमा तैयार की जाती है। इसके बाद रामलीला का मंचन किया जाता है, जिसमें भगवान श्रीराम और रावण के बीच युद्ध का नाटकीय प्रदर्शन होता है। रामलीला के अंतिम चरण में भगवान श्रीराम के पात्र द्वारा रावण की प्रतिमा का वध किया जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण कार्यक्रम में शामिल होकर धार्मिक परंपरा के साक्षी बनते हैं।
स्थानीय मान्यता के अनुसार रावण की नाभि में अमृत कुंड मौजूद था, जिसके कारण उसका वध करना कठिन माना जाता था। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान श्रीराम ने रावण की नाभि पर बाण चलाकर उसका अंत किया था। इसी मान्यता को आधार बनाकर भूमका और हिर्री के ग्रामीण रावण दहन के बजाय रावण वध की परंपरा निभाते हैं। ग्रामीणों का विश्वास है कि रावण की नाभि में मौजूद अमृत को जलाना उचित नहीं है, इसलिए यहां पुतले को आग लगाने के बजाय प्रतीकात्मक रूप से उसका वध किया जाता है।
इस परंपरा की सबसे विशेष बात रावण की नाभि से निकलने वाले प्रतीकात्मक अमृत का तिलक लगाना है। प्रतिमा निर्माण के दौरान रावण की नाभि में मिट्टी का एक पात्र रखा जाता है, जिसमें लाल रंग का द्रव्य भरा जाता है। रामलीला के दौरान भगवान श्रीराम द्वारा रावण वध किए जाने के बाद इसी लाल रंग के द्रव्य को अमृत का प्रतीक मानकर ग्रामीण अपने माथे पर तिलक लगाते हैं। स्थानीय लोगों की धार्मिक मान्यता है कि इस तिलक से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि तथा खुशहाली का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
ग्राम हिर्री के रामलीला समिति सदस्य भारद्वाज बैध और ग्राम भूमका के रामलीला समिति सदस्य बैजनाथ तिवारी के अनुसार यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। उन्होंने बताया कि देश के अधिकांश स्थानों पर रावण दहन किया जाता है, लेकिन उनके गांवों में रावण की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर उसका वध किया जाता है। रामलीला के समापन के बाद ग्रामीण प्रतीकात्मक अमृत का तिलक लगाकर स्वस्थ और सुखमय जीवन की कामना करते हैं।
ग्राम हिर्री के सरपंच सुकमन मरकाम सहित स्थानीय ग्रामीणों की सहभागिता से यह सांस्कृतिक परंपरा आज भी जारी है। दशहरा पर्व के अवसर पर आयोजित रामलीला और रावण वध कार्यक्रम में आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं। यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ ग्रामीण संस्कृति और सामूहिक सहभागिता का भी प्रतीक है।
कोंडागांव जिले के भूमका और हिर्री गांवों की यह अनूठी परंपरा छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति और विविध धार्मिक मान्यताओं को दर्शाती है। रावण दहन के स्थान पर मिट्टी की प्रतिमा का वध और उसकी नाभि से निकले प्रतीकात्मक अमृत का तिलक लगाने की परंपरा इन गांवों को विशेष पहचान देती है। पीढ़ियों से चली आ रही इस सांस्कृतिक विरासत को ग्रामीण आज भी आस्था और उत्साह के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।