कवर्धा की बैगा महिला उद्यमी श्रीबाई बैगा ने बेंगलुरु में बनाई पहचान, पारंपरिक आभूषणों का कर रहीं प्रदर्शन

छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले की बैगा महिला उद्यमी श्रीबाई बैगा बेंगलुरु स्थित अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में आयोजित प्रदर्शनी में अपने हाथों से तैयार पारंपरिक आभूषणों का प्रदर्शन कर रही हैं। उनकी यह यात्रा न केवल बैगा समुदाय की सांस्कृतिक विरासत को व्यापक मंच दे रही है, बल्कि पारंपरिक हस्तशिल्प को आजीविका और महिला उद्यमिता से जोड़ने का अवसर भी प्रदान कर रही है। बिरन पहल के माध्यम से उनके हुनर को नए बाजारों तक पहुंचाने की दिशा में प्रयास किया जा रहा है। खास बात यह है कि बेंगलुरु तक की यह उनकी पहली रेल यात्रा है।

Oct 9, 2026 - 17:45
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कवर्धा की बैगा महिला उद्यमी श्रीबाई बैगा ने बेंगलुरु में बनाई पहचान, पारंपरिक आभूषणों का कर रहीं प्रदर्शन

UNITED NEWS OF ASIA. सौरभ नामदेव, कवर्धा। छत्तीसगढ़ के वनांचल में संजोई गई बैगा समुदाय की पारंपरिक कला अब बेंगलुरु तक अपनी पहचान बना रही है। कबीरधाम जिले की बैगा महिला उद्यमी श्रीबाई बैगा अपने हाथों से तैयार पारंपरिक आभूषणों को अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में आयोजित प्रदर्शनी के माध्यम से व्यापक मंच पर प्रस्तुत कर रही हैं। उनकी यह पहल स्थानीय परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को नए लोगों तक पहुंचाने के साथ पारंपरिक हुनर को आजीविका से जोड़ने की प्रेरक कहानी बनकर सामने आई है। खास बात यह है कि बेंगलुरु तक पहुंचने के लिए उन्होंने पहली बार रेल यात्रा की है।

बैगा समुदाय की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान, पारंपरिक रीति-रिवाज और पीढ़ियों से संजोया गया पारंपरिक ज्ञान है। बैगा समुदाय भारत के विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) में शामिल है। श्रीबाई बैगा अपने हस्तनिर्मित आभूषणों के माध्यम से इसी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं। उनके हाथों से तैयार आभूषणों में समुदाय की परंपराओं और स्थानीय शिल्पकला की झलक दिखाई देती है। उनके लिए यह कला केवल सांस्कृतिक पहचान का माध्यम नहीं, बल्कि आजीविका और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर भी है।

पहली रेल यात्रा, नई संभावनाओं की ओर कदम
श्रीबाई बैगा के लिए बेंगलुरु की यात्रा केवल एक शहर से दूसरे शहर तक पहुंचने का सफर नहीं है, बल्कि अपने हुनर को व्यापक पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। पहली बार रेल यात्रा कर बेंगलुरु पहुंचना उनके लिए नया अनुभव है। अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित प्रदर्शनी में वे अपने हाथों से बनाए पारंपरिक आभूषणों को लोगों के सामने प्रस्तुत कर रही हैं। इस मंच के माध्यम से उनके उत्पादों को नए दर्शकों तक पहुंचाने और संभावित बाजारों से जुड़ने का अवसर मिल रहा है।

बिरन से पारंपरिक हस्तशिल्प को मिल रहा आजीविका का आधार
बिरन पारंपरिक ज्ञान, आदिवासी हस्तशिल्प और स्थानीय कौशल को आजीविका एवं उद्यमिता के अवसरों से जोड़ने की पहल है। इसके माध्यम से पारंपरिक शिल्प से जुड़ी महिलाओं को अपने उत्पादों का प्रदर्शन करने और बाजार तक पहुंच बनाने के अवसर मिल रहे हैं। श्रीबाई बैगा की सहभागिता इसी दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे उनके पारंपरिक आभूषणों को स्थानीय क्षेत्र से बाहर पहचान दिलाने और संभावित ग्राहकों तक पहुंचने की संभावना बनती है।

महिला उद्यमिता और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा
श्रीबाई बैगा की यह यात्रा दर्शाती है कि पारंपरिक कला और स्थानीय कौशल को उचित मंच मिले तो वे आजीविका के अवसरों में बदल सकते हैं। उनके आभूषणों का बेंगलुरु की प्रदर्शनी में प्रदर्शन बैगा समुदाय की सांस्कृतिक विरासत को सामने लाने का अवसर है। साथ ही यह पहल अन्य आदिवासी महिलाओं को भी अपने हुनर को पहचानने, उसे व्यवसाय से जोड़ने और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर सकती है।

कबीरधाम के वनांचल से बेंगलुरु तक पहुंची श्रीबाई बैगा की यह यात्रा पारंपरिक शिल्पकला, महिला उद्यमिता और सांस्कृतिक पहचान के संगम को दर्शाती है। बिरन के माध्यम से उनके हुनर को नए मंच मिलने से स्थानीय कला को व्यापक पहचान दिलाने और उसे आजीविका का मजबूत आधार बनाने की संभावनाएं बढ़ रही हैं।